
वंदे मातरम का विरोध Publish Date : 23/10/2026
वंदे मातरम का विरोध
प्रो0 आर. एस. सेंगर
1896 का कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता रहिमतुल्ला एम. सयानी कर रहे थे, के मंच से गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने “वन्देमातरम” गाया आगे चल कर इस गीत ने भारतीय मानस को मातृभूमि के प्रति ऐसे प्रेम और जोश से भर दिया कि 1905 के बंग भंग प्रस्ताव के विरोध और मातृभूमि के लिए मर मिटने की प्रेरणा देने वाला एक गान बन गया।
हालत यह हो गए कि अंग्रेज सरकार ने “वंदे मातरम” शब्द को ही प्रतिबंधित कर दिया। सब ठीक ठाक चल रहा था पूरे देश के क्रांतिकारी वन्देमातरम गा कर देश की आजादी के लिए मतवाले हो रहे थे और वंदे मातरम देशभक्तों के प्रत्येक कार्यक्रम का अनिवार्य अंग बन गया। 1923 का कांग्रेस अधिवेशन आंध्र प्रदेश के काकीनाडा में हो रहा था, परंपरागत रूप से वन्देमातरम गाने के लिए पंडित विष्णु पलुस्कर मंच पर आए, लेकिन इस बार मंच पर अध्यक्षता कर रहे मौलाना मोहम्मद अली ने वन्देमातरम का विरोध किया यह कह कर कि इस्लाम में संगीत के लिए कोई स्थान नहीं है।

विष्णु पुलस्कर वन्देमातरम गाने पर अड़े रहे अतः मौलाना सभागार से बाहर चले गए, यह पहला विरोध था वंदे मातरम का। इसके बाद भी कांग्रेस के अधिवेशनों में वन्देमातरम का गायन चलता रहा लेकिन साथ ही कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति भी प्रभावी होती रही अतः मोहम्मद अली जिन्ना की वंदेमातरम बंद करने की लगातार मांग के दबाव में 1937 के अधिवेशन में वन्देमातरम के बाकी छंद यह कह कर गाने से मना करने का प्रस्ताव आया कि उसमें तो हिंदू देवी देवताओं का वर्णन है।

दो बातें स्मरण करने की हैं कि 1896 में जब पहली बार गया गया तब मंच पर एक मुस्लिम हो थे जिन्होंने कोई आपत्ति नहीं की और वर्षों तक किसी मुसलमान ने आपत्ति नहीं की, वहीं मौलाना मोहम्मद अली जिसने पहला विरोध किया उनकी मृत्यु लंदन में हुई और अंतिम संस्कार उनकी इच्छा अनुसार यरूशलम में मस्जिद ए अश्का में किया गया। अर्थात उनकी निष्ठा भारत भूमि के प्रति इतनी थी कि मरने के बाद भी इस मिट्टी में दफन भी नहीं होना चाहते थे। आज भी वंदेमातरम का विरोध किया जा रहा है लेकिन क्यों इसका कोई उत्तर नहीं है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।