
अकेलापन केवल दूसरों से ही नहीं बल्कि स्वयं से भी है दूरी Publish Date : 22/10/2026
अकेलापन केवल दूसरों से ही नहीं बल्कि स्वयं से भी है दूरी
प्रो0 आर. एस. सेंगर
मनुष्य अक्सर सोचता है कि अकेलापन तब होता है, जब कमरा खाली हो, जब भीड़ में परिचित चेहरा न मिले, जब चिट्ठियां न आएं, फोन न बजे या बातचीत के लिए कोई साथी न हो। लेकिन, इससे कहीं अधिक गहरा और सूक्ष्म एक दूसरा अकेलापन है, जो भीड़ के बीच में ही जन्म लेता है। जैसे कि आप किसी सभा में बैठे हैं आपके चारों ओर लोग हैं। हंसी है, शब्द हैं, अभिवादन हैं, विचारों का आदान-प्रदान है।
ऐसे में, देखने वाला तो यही कहेगा कि आप अकेले नहीं हैं। पर, उसी क्षण आपके भीतर कोई ऐसा विचार उत्पन्न हो सकता है, जिसे आप शब्द न दे पा रहे हों। कोई ऐसी अनुभूति, भय, आकांक्षा या फिर स्मृति हो सकती है, जिसे आप दूसरों तक पहुंचा नहीं सकते। यह ऐसी स्थिति होती है, जब आपके और संसार के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो जाती है।

मनुष्य की त्रासदी यह है कि जो सबसे महत्वपूर्ण है, वही अक्सर कहा नहीं जा सकता। जैसे कोई व्यक्ति समुद्र को एक छोटे पात्र में भरने का प्रयास करे, वैसे ही हम अपने विशाल आंतरिक जीवन को कुछ वाक्यों में समेटने का प्रयास करते हैं। इसलिए, कई बार ऐसा होता है कि दो लोग एक-दूसरे को जानते-समझते हैं, किंतु उस मौन को नहीं जानते, जहां व्यक्ति अपने सबसे वास्तविक रूप में रहता है।
यही वह स्थान है, जहां अकेलापन जन्म लेता है। वर्तमान समय में देखा जाए संवाद के साधन तो बहुत हैं, मगर संवाद की उत्सुकता पहले से कहीं अधिक कम हो गई है। यही कारण है कि मनुष्य शायद ही कभी अपने हृदय के केंद्र तक पहुंच पाता है। वह अपने आपको भीड़ से घिरा तो पाता है, लेकिन भीतर एक खालीपन महसूस करता है। लेकिन, इसी अकेलेपन में एक संकेत भी छिपा होता है। जब मनुष्य यह देख लेता है कि कोई दूसरा उसके भीतर के संपूर्ण सत्य को नहीं जान सकता, तब वह धीरे-धीरे इस प्रश्न की ओर बढ़ता है कि क्या मैं स्वयं अपने भीतर के उस सत्य को जानता हूं?

हम लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि दूसरे हमें समझते नहीं हैं, जबकि वास्तव में तो हमने खुद अपने आपको ही समझने का प्रयास भी नहीं किया होता है। हम चाहते हैं कि कोई हमारे हृदय की गहराइयों को पढ़ ले, जबकि वे गहराइयां तो हमारे लिए भी अपरिचित रहती हैं। इसलिए, अकेलापन केवल दूसरों से दूरी नहीं है, वह स्वयं से भी दूरी हो सकता है। शायद इसी कारण मनुष्य को कभी-कभी मौन की भी आवश्यकता होती है।
मौन वह स्थान है, जहां मनुष्य उन ध्वनियों को सुन सकता है, जो सामान्य जीवन के शोर में दब जाती हैं। जहां हम अपने भय, इच्छाओं, पछतावों और अपनी उम्मीदों का सामना कर सकते हैं। बहुत-से लोग इस मौन से डरते हैं। इसी डर के लते वे निरंतर व्यस्त रहते हैं, ताकि उनका खुद से सामना न हो जाए।
लेकिन, जो व्यक्ति साहसपूर्वक अपने एकांत में प्रवेश करता है, वह धीरे-धीरे पाता है कि अकेलापन केवल रिक्तता नहीं है, उसके भीतर एक गहरा आह्वान छिपा है। इसलिए, जो व्यक्ति अपने भीतर के मौन से परिचित हो जाता है, वह दूसरों के साथ भी अधिक सच्चे संबंध बना सकता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।