
कहीं बहा न ले जाएं आपकी कमजोर भावनाएं Publish Date : 20/10/2026
कहीं बहा न ले जाएं आपकी कमजोर भावनाएं
प्रो0 आर. एस. सेंगर
आज भी केवल परीक्षा के नंबरों को ही सफलता का पैमाना माना जाता है, लेकिन असल जिंदगी में कामयाब होने के लिए बच्चों का भावनात्मक रूप से मजबूत होना कहीं अधिक जरूरी होता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में किताबी ज्ञान (आईक्यू) अब सफलता की गारंटी नहीं रहा।
हमारे कॅरियर विशेषज्ञ डॉ0 आर. एस. सेंगर आपको बता रहे हैं कि कैसे बच्चों को सिखाएं उनके मन के तूफानों से लड़न-
हजारों के एक नामचीन स्कूल में पढ़ने वाली 12 वर्षीय अनन्या को कोडिंग और रोबोटिक्स में महारत हासिल थी। उसको जानने वाला हर कोई उसे भविष्य की टेक-स्टार मानता था, लेकिन एक दिन जब उसकी सहेली को क्लास कैंटीन में चॉकलेट मिल गई, तो अनन्या इस ईर्ष्या और हर कोई समझ नहीं पाई। उसने खुद को आस-पास और इंटरनेट मीडिया से पूरी तरह काट लिया और गहरी हीनभावना की शिकार हो गई।
अनन्या की यह स्थिति बताती है कि आज का एआई-संचालित दुनिया में हम बच्चों के दिमाग को तो शार्प कर रहे हैं, लेकिन उनके दिल को बेहद कमजोर बनाकर छोड़ रहे हैं। यह सच है कि स्कूल-कॉलेज में दाखिला पाने या नौकरी हासिल करने के लिए अकादमिक स्कोर अभी भी एक अहम सीढ़ी होती हैं, लेकिन वह सफलता की पूरी परिभाषा नहीं दिखाते हैं। आईक्यू हमारी बौद्धिक क्षमताओं का सिर्फ एक हिस्सा है।
बदलता सफलता का पैमाना
आज केवल अधिक अंकों को ही सफलता का पैमाना मानना सबसे बड़ी भूल है। सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में टॉप करे, लेकिन इस अंधी दौड़ में हम बच्चे के भावनात्मक कोष्ठक यानी उसकी भावनात्मक मजबूती को नजरअंदाज कर देते हैं, जो कि उसके पूरे जीवन का एक महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ होता है।
असेंबली से सही शुरुआत
बेहतरीन स्कूल इस सोच पर काम करते हैं कि जहां शांति है, वहीं समृद्धि है। यही वजह है कि स्कूलों में दिन की शुरुआत कुछ मिनट के ध्यान सत्र से होती है, जिसमें सुबह की असेंबली के दौरान सभी बच्चे व शिक्षक शांत अवस्था में प्रवेश करते हैं।
से पहचानें स्वस्थ लक्षण
बच्चों के भावनात्मक संघर्षों के लक्षण उम्र के हिसाब से अलग-अलग होते हैं। तीन से आठ साल के बच्चे अक्सर स्कूल न जाने के डर, टूट-फूट के बहाने बनाते हैं। बार-बार चिड़चिड़ापन, नखुश रहना, बार-बार लड़ना या शिकायत करना, बहुत ज्यादा चुप रहना और अटेंशन पाने के लिए जिद करना किशोरावस्था में बच्चे बहुत ज्यादा गुस्से में आकर, अपने कमरे में सीमित रहने लगे, बातचीत पर नजर या नाराजगी दिखाएं, अपनी बातें साझा करने से कतराएं। अकादमिक प्रदर्शन में बड़ी गिरावट भी इसका एक प्रमुख संकेत हो सकती है।
पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में टॉप करे, लेकिन इस अंधी दौड़ में हम बच्चे के भावनात्मक कोष्ठक यानी उसकी भावनात्मक मजबूती को नजरअंदाज कर देते हैं, जो कि उसके पूरे जीवन का एक महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ होता है।
एआई से निपटे बच्चों की भावनाओं से

स्कूलों में मनोवैज्ञानिक काउंसलर होते हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि शिक्षक और गैर-शिक्षण दोनों तरह का स्टाफ यह समझे कि किसी बच्चे में पैनिक अटैक या एंग्जायटी के लक्षण दिखने पर कैसे प्रतिक्रिया देनी है। जब बच्चा असहज महसूस करता है, तो उसका शरीर दूसरों की अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार नहीं कर पाता। पूरे तरह से प्रशिक्षित स्टाफ टूटे ऐसे मुद्दों को संज्ञान में लेता है। हालांकि, आन-द-स्पॉट काउंसलिंग सिर्फ डैमेज कंट्रोल की तरह है। असली और दुनिया की जीवन-प्रशिक्षण पहली या दूसरी कक्षा से ही शुरू हो जाना चाहिए, ताकि बच्चे अपनी भावनाओं के प्रति जागरूक रहें, सही ढंग से खुद को अभिव्यक्त कर सकें और जरूरत पड़ने पर परिवार या सही सपोर्ट सिस्टम तक आसानी से पहुंच सकें।
आपसी तालमेल से बनेगी बात
यदि माता-पिता और स्कूल एक ही उद्देश्य साझा नहीं करेंगे तो बच्चे की मदद करने में लंबा समय लग सकता है। स्कूल और परिवार के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए। यदि घर का माहौल थोड़ा सख्त है, तो स्कूल बच्चों को थोड़ा खुलापन दे सकता है और कभी-कभी स्कूल के कड़े नियमों के बीच माता-पिता बच्चों को थोड़ा स्पेस दे सकते हैं। कुछ दिनों के लिए बच्चों को थोड़ी छुट और सुरक्षित माहौल देना जरूरी है ताकि वे अपने मन की बात खुलकर कह सकें।
बदले भावनाओं का गेम
इंटरनेट मीडिया के दौर में दूसरे बच्चों की लाइफस्टाइल या उपलब्धियों को देखकर बच्चों में फोमो (फियर ऑफ मिसिंग आउट) और ईर्ष्या की भावना बहुत जल्द पनपती है। माता-पिता को इस भावनात्मक भावना को भांपकर बच्चे को डांटने के बजाय उससे संवाद करना चाहिए। उन्हें समझाएं कि हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है। कभी-कभी बच्चे अपनी बात नहीं बोल पाते या आपसी झगड़ों के बस यह कहकर नहीं टाल जा सकता कि जाओ, हाथ मिलाओ और भूल जाओ। इसके लिए शिक्षकों को बच्चों को व्यक्तिगत रूप से सुनना चाहिए। कक्षा में ऐसे हलचल या प्रोजेक्ट्स बनाए चाहिए, जहां हर बच्चा अपनी विशिष्ट खूबी के साथ टीम में योगदान दे सके। गैर-अकादमिक गतिविधियों, सांस्कृतिक आयोजनों या सामूहिक मंच पर आधारित प्रोजेक्ट्स में जुड़ने का मौका बिना किसी दबाव के खुद को अभिव्यक्त करने का बेहतर मंच मिलता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।