दिल्ली का सौ साल पुराना स्वाद नागौरी हलवा      Publish Date : 09/10/2026

दिल्ली का सौ साल पुराना स्वाद नागौरी हलवा

                                                                                                 प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं सरिता सिंह

भारत हमेशा से ही खाने-पीने का शौकीन देश रहा है, जहां हर क्षेत्र के अपने खास व्यंजन हैं। ऐसे ही कुछ खास व्यंजनों से हम आपको रूबरू कराते हैं ‘पंडे स्वाद’ कॉलम में। इस बार पेश है पुरानी दिल्ली की गलियों में छिपा सौ साल पुराना मीठा-नमकीन स्वाद नागौरी-हलवा। बता रही हैं सरिता सिंह-

पुरानी दिल्ली की गलियों में सुबह का नाश्ता सिर्फ पेट भरने का नाम नहीं होता, बल्कि यहां स्वाद का पूरा अनुभव होता है। ऐसा ही एक नाश्ता है नागौरी हलवा। नाम सुनकर शायद आपको सिर्फ हलवा याद आए, मगर इसकी कहानी थोड़ी अलग है। यहां एक साथ मिलते हैं कुरकुरी नागौरी, आलू या छोले की चटपटी सब्जी और देसी घी में बना सूजी का हलवा।

साथ में चाहें तो कलौंजी या अचार भी ले सकते हैं। सबसे मजेदार बात है कि इसे एक साथ मिलाकर खाया जाता है। मतलब एक निवाले में कुरकुरी नागौरी, नमकीन सब्जी और मीठा हलवा यानी तीन अलग स्वाद एक साथ।

कुरकुरी गोल पूड़ियों का जादू

नागौरी हलवा को पुरानी दिल्ली का दशकों पुराना नाश्ता कह सकते हैं, जिसकी जड़ें बेड़मी-आलू जैसे पारंपरिक नाश्ते से जुड़ी मानी जाती हैं। कहते हैं, इसी के साथ देसी घी का सूजी हलवा परोसा जाने लगा और धीरे-धीरे यह एक खास कॉम्बो बन गया। हालांकि, बेड़मी से अलग इसे ज्यादा कुरकुरा और गोल बनाया गया, जिसे नाम मिला-नागौरी।

पुरानी दिल्ली में श्याम स्वीट्स इस परंपरा से जुड़ी सबसे पुरानी दुकानों में से एक है। यहां 1910 में दुकान के संस्थापक आनंदी मल ने नागौरी हलवा की शुरुआत की थी। दुकान की 5वीं पीढ़ी के संजय और अजय अग्रवाल और छठी पीढ़ी के भरत अग्रवाल आज भी इस स्वाद को आगे बढ़ा रहे हैं। दुकान के पांचवीं पीढ़ी के मालिक अजय अग्रवाल बताते हैं कि यहां नागौरी बनाने के लिए मैदा नहीं, सिर्फ सूजी का इस्तेमाल होता है। यही नागौरी को खास कुरकुरापन देता है।

सौ साल पुराने स्वाद की परंपरा

                               

नागौरी हलवा अब सिर्फ पुरानी दिल्ली तक सीमित नहीं है। मक्खन लाल, राम स्वरूप हलवाई, शिव मिठाई भंडार, रेड फोर्ट स्वीट्स जैसे पुराने हलवाई आज भी इसे परोसते हैं।

हालांकि, कई जगह यह नाश्ते पर रविवार सुबह से दोपहर तक मिलता है। अगर नागौरी को थोड़ा क्रिस्प अंदाज में खाना हो, तो दोबारा हलवाई के यहां हल्की आंच में सेंक सकते हैं। चटनी-सब्जी के साथ नागौरी और फिर उसके बीच से खोलकर उसमें हलवा, आलू की सब्जी, दही, चटनी, चाट मसाला व हरी मिर्च डाली जाती है। फिर इसे मोमलप्ले की तरह उठाकर खाइए। एक ही बार में मीठा, नमकीन, खट्टा और चटपटा स्वाद। यही तो पुरानी दिल्ली की खासियत है।

खैर! अगली बार जब पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमने निकलें, तो सिर्फ लाल किला और चांदनी चौक तक ही मत रुक जाइए। किसी पुराने हलवाई की दुकान पर बैठिए, नागौरी तोड़िए और उसके अंदर पुरानी दिल्ली का सौ साल पुराना स्वाद तलाशिए।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।