शुक्र क्यों है सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह      Publish Date : 05/10/2026

     शुक्र क्यों है सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह

                                                                                                                       प्रो0 आर. एस. सेंगर

करीब 4.5 अरब साल पहले जब सौरमंडल बना, तब शुक्र आज की तरह तपता हुआ ग्रह नहीं था। वैज्ञानिकों का मानना है कि शुरुआती शुक्र पर पानी की बड़ी मात्रा और संभवतः महासागर भी रहे होंगे। लेकिन, समय के साथ सूरज की चमक बढ़ी और शुक्र पर ऐसा बदलाव शुरू हुआ, जिसने उसे सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह बना दिया।

दिलचस्प यह है कि सूरज के सबसे करीब होने के बावजूद बुध सबसे गर्म ग्रह नहीं है। सूरज की सीधी रोशनी वाले बुध के हिस्से का तापमान दिन में करीब 430 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है, लेकिन रात में यही करीब -180 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। शुक्र पर ऐसा अंतर नहीं दिखता। वहां सतह का तापमान करीब 464 डिग्री सेल्सियस बना रहता है। इसका कारण है ग्रीनहाउस प्रभाव। सूरज की गर्मी पृथ्वी की सतह को गर्म करती है, जिसके बाद सतह इन्फ्रारेड विकिरण के रूप में ऊर्जा छोड़ती है।

                                        

वायुमंडल में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड, जलवाष्प व मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें इस ऊर्जा के कुछ हिस्से को सोख लेती हैं और गर्मी को बाहर जाने से रोकती हैं। पृथ्वी के लिए यह ग्रीनहाउस प्रभाव बेहद जरूरी है। इसके बिना पृथ्वी का औसत तापमान करीब -18 डिग्री सेल्सियस होता और यह रहने योग्य नहीं होती। शुक्र पर यही प्रक्रिया नियंत्रण से बाहर हो गई। शुरुआती सौरमंडल में सूरज आज की तुलना में करीब 30 फीसदी कम चमकीला था।

जैसे-जैसे सूरज की चमक बढ़ी, शुक्र पर मौजूद पानी अधिक मात्रा में वाष्पित होकर वायुमंडल में जाने लगा। सतह पर पानी कम होने से कार्बन डाइऑक्साइड को महासागरों में घुलने या चट्टानों में जमा होने का मौका भी घट गया। नतीजतन, अधिक कार्बन डाइऑक्साइड वायुमंडल में जमा होने लगी। इससे तापमान बढ़ा, पानी वाष्प बना और अधिक जलवाष्प ने गर्मी को और रोकना शुरू कर दिया। आज शुक्र के वायुमंडल में करीब 96 फीसदी कार्बन डाइऑक्साइड है। वहां वायुमंडलीय दबाव पृथ्वी की सतह से 90 गुना से अधिक है। इतना ज्यादा दबाव ऐसा है, जैसे आपके कंधों पर पांच हाथी खड़े हों!

जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी पर ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही है। हालांकि, पृथ्वी का शुक्र जैसा 464 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचना हमारी जीवन अवधि में संभव नहीं है। फिर भी, शुक्र हमें एक चेतावनी देता है कि जलवायु का संतुलन बिगड़ने पर एक रहने योग्य ग्रह भी धीरे-धीरे अधिक गर्म और कम अनुकूल बन सकता है।

-द कन्वर्सेशन

बुध पर तापमान दिन में 430 और रात में -180 डिग्री सेल्सियस रहता है, जबकि शुक्र की सतह 464 डिग्री सेल्सियस तक तपती रहती है।

जैसे-जैसे सूरज की चमक बढ़ी, शुक्र का पानी अधिक मात्रा में वाष्पित होने लगा और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा भी बढ़ने लगी। नतीजतन, ग्रीनहाउस प्रभाव तेज हुआ और तापमान बढ़ता गया।

आखिर रेगिस्तान इतने गर्म क्यों होते हैं

शुआंग-ये वू

रेगिस्तान का नाम सुनते ही आंखों के सामने तपती धूप, दूर-दूर तक फैले रेत के टीले और झुलसा देने वाली गर्मी की तस्वीर उभर आती है-जैसे सहारा रेगिस्तान। पृथ्वी पर दर्ज किए गए सबसे अधिक तापमान भी रेगिस्तानी इलाकों में मिले हैं। कैलिफोर्निया की डेथ वैली में हवा का तापमान 56.7 डिग्री सेल्सियस व ईरान के लुट रेगिस्तान की सतह का ताप 80.8 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया जा चुका है। हालांकि, रेगिस्तान की पहचान केवल गर्मी से नहीं होती।

जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार, किसी क्षेत्र को रेगिस्तान तब कहा जाता है, जब वहां सालभर 250 मिलीमीटर (10 इंच) से कम वर्षा या बर्फबारी हो। यानी, रेगिस्तान गर्म भी हो सकते हैं और बेहद ठंडे भी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अंटार्कटिका है, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तान माना जाता है। यहां तापमान माइनस 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, पर अत्यंत कम बर्फबारी होने के कारण यह रेगिस्तान की श्रेणी में आता है। दुनिया के अधिकांश गर्म रेगिस्तान भूमध्य रेखा के उत्तर व दक्षिण में लगभग 30 डिग्री अक्षांश पर स्थित हैं।

दरअसल, भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें सबसे ज्यादा सीधी पड़ती हैं, जिससे हवा गर्म होकर ऊपर उठती है। वहीं 30 डिग्री अक्षांश के आसपास यही हवा ठंडी होकर नीचे उतरती है और उसमें नमी लगभग समाप्त हो जाती है। इसलिए, यहां वर्षा नहीं होती और शुष्क रेगिस्तानी परिस्थितियां बन जाती हैं। रेगिस्तानों की भीषण गर्मी के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं। पहला, यहां बादल लगभग नहीं बनते। बादल सामान्यतः सूर्य की किरणों का कुछ हिस्सा रोक लेते हैं, पर रेगिस्तान में शुष्क हवा के कारण ऐसा नहीं हो पाता। नतीजतन, सूर्य की अधिकांश ऊर्जा सीधे जमीन तक पहुंचती है और सतह तेजी से गर्म हो जाती है। दूसरा कारण रेत व चट्टानों का स्वभाव है। ये बहुत जल्दी गर्म हो जाते हैं।

सूर्यास्त के बाद इनमें संचित गर्मी भी तेजी से निकल जाती है। इसी वजह से रेगिस्तान में दिन में भीषण गर्मी हो सकती है और रात को कड़ाके की ठंड। तीसरा कारण वाष्पीकरण से मिलने वाली प्राकृतिक ठंडक (इवैपोरेटिव कूलिंग) का अभाव है। सामान्य क्षेत्रों में पौधे वातावरण में जलवाष्प छोड़कर आसपास का तापमान कम करते हैं। पर, रेगिस्तान में नमी और वनस्पति, दोनों ही बहुत कम होती हैं। इसलिए, यह प्राकृतिक शीतलन लगभग समाप्त हो जाता है और गर्मी जमीन के पास ही बनी रहती है।

अधिकांश गर्म रेगिस्तान भूमध्य रेखा के उत्तर व दक्षिण में 30 डिग्री अक्षांश पर स्थित हैं। हालांकि, अंटार्कटिका जैसे बेहद ठंडे रेगिस्तान भी हैं।

भूमध्य रेखा पर सूर्य की सीधी किरणों से हवा गर्म होकर ऊपर उठती है। 30 डिग्री अक्षांश पर यही हवा ठंडी व शुष्क होकर नीचे उतरती है। नमी की कमी के कारण वर्षा नहीं होती और यहां रेगिस्तानी परिस्थितियां बन जाती हैं।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।