
रक्षा का संकल्प Publish Date : 29/08/2026
रक्षा का संकल्प
प्रो0 आर. एस. सेंगर
शरीर का कोई अंग स्वयं में चाहे कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, लेकिन उसकी उपयोगिता और उसका जीवन अस्तित्व शरीर के साथ ही सम्भव हो पाता है। इसी प्रकार कोई मनुष्य स्वयं में चाहे कितने ही गुणों से युक्त क्यों न हो वस्तुतः उसका अस्तित्व तो सजीवों के संसार में ही रहता है। आत्मा देह को प्राप्त करने के बाद ही धर्म का प्रकटीकरण कर पाती है और यह धर्म सदैव किसी और के प्रति व्यवहार से संबंधित होता है।
हमारे आस पास जो कुछ भी है उसकी रक्षा हमें इसलिए करनी होती है कि वह हैं, तब तक ही हम और हमारा अस्तित्व हैं, यह चिंतन विश्व में सर्वत्र में किसी न किसी रूप में स्वीकार किया ही गया है। किसी ने मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा अर्थात समाज से ही मनुष्य है, यदि समाज नहीं तो मनुष्य भी नहीं। इसी समाज को संरक्षित करने की भावना का संकल्प है होता है रक्षा बंधन का त्यौहार।
अपना इतिहास और उससे प्राप्त प्रेरणाएं सदैव इस संकल्प को प्रभावी बनाती हैं कि जब हम किसी की रक्षा करने के प्रति संकल्पित होते हैं तब स्वयं ही अपना जीवन और उसका अर्थ पूर्ण लगने लगता है। हमारे परिवार, हमारे गांव, मुहल्ले, हमारा देश, पर्यावरण, यह सभी चीजें हैं जो कि किसी न किसी रूप से हमसे सदैव ही जुड़े रहते हैं। इन सभी की रक्षा करने का संकल्प, हमारे जीवन को सदैव ही सद्-मार्ग पर चलाने में सहायक सिद्ध होता आया है।
इतिहास इसका जीता जागता प्रमाण है कि जब जब समाज में एक दूसरे की सुरक्षा का संकल्प कमजोर हुआ तब तब अराजकता और संवेदनहीनता में वृद्धि आई और पूरा समाज ही संकट ग्रस्त हुआ है। सड़क पर चलते हुए, ऑफिस में काम करते हुए या फिर घर में परिवार के साथ रहते हुए, सदैव एक दूसरे की सुरक्षा का भान रखना और रक्षा का प्रयास करना ही इस रक्षा बंधन का उद्देश्य है।
अतः आइए हम सब अपने राष्ट्र के साथ संपूर्ण विश्व की सुरक्षा करने के लिए अपने आस पास ऐसी सभी चीजों सुरक्षा का संकल्प ग्रहण करें, जिन्हें इसकी अत्यंत आवश्यकता है। रक्षा बंधन के इस शुभ अवसर पर हमाचे चैनल किसान जागरण डॉट कॉम की ओर से आप सभी बन्धुओं और पाठकों को रक्षा बंधन की अनेक अनेक शुभेक्षाएं।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
