
सफलता का साक्षी होता है सत्य Publish Date : 21/08/2026
सफलता का साक्षी होता है सत्य
प्रो0 आर. एस. सेंगर
इस नसवर संसार में कभी भी नष्ट नहीं होने वाली वस्तु क्या है? कभी भी नष्ट नहीं होने वाली वस्तु है सत्य। सत्य की विजय केवल नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि यह तो सृष्टि का शाश्वत नियम है। वही सत्य वास्तविक सत्य कहलाने के योग्य है, जिसके पीछे समस्त प्राणियों कल्याण की भावना निहित रहती हो। ऐसा सत्य कभी भी किसी व्यक्ति विशेष के हितों तक सीमित नहीं रहता, अपितु समग्र मानवता के मंगल का लाभ का मार्ग प्रशस्त करता है। असत्य कभी भी स्थाई विजय प्राप्त नहीं कर सकता। असत्य क्षणिक रूप से भले ही सफल दिखाई दे, किन्तु उसकी यह सफलता अंततः उसके विनाश का कारण बन जाती है।
उपनिषदों में ब्रह्म का अत्यंत सुन्दर वर्णन मिलता है। इसमें कहा गया है कि वह इतना विराट है कि मानव मन उसकी कल्पना तक नहीं कर सकता। वह इतना सूक्ष्म है कि परमाणु, अणु और इलेक्ट्रॉन आदि कण भी उससे बड़े हैं। उसकी व्यपकता और सूक्ष्मता, दोनों ही मानव की सामान्य बुद्वि से परे है। वहीं परम सत्ता प्रत्येक जीव के भीतर प्रकाशमान है, जो उसे अपने आप से दूर मानकर चलता है, उसके लिए वह बहुत दूर प्रतीत होता है, किन्तु जो व्यक्ति उसे अपने हृदय में अनुभव करता है, उसके लिए वह सबसे अधिक निकट है। इसलिए ईश्वर की खोज में संसार में कहीं भी भटकने की आवश्यकता नहीं होती है। वह हमारे अपने अस्तित्व, हमारी चेतना और हमारे हृदय की गहराईयों में सदैव से ही विद्यमान रहा है।
शास्त्र बताते हैं कि परमत्मा को न तो देखा जा सकता है और न ही उसे व्यक्त किया जा सकता है। केवल कर्मकाण्ड़ तपस्या या बाहरी आडम्बर एसकी प्राप्ति का साधन नहीं बनते हैं। जब किसी सच्चे सद्गुरू के मार्गदर्शन में साधक ज्ञान प्राप्त करता है और श्रद्वा एवं भक्ति से साधाना पूण करता है, तभी उसका मन निर्मल हो जाता है। उसी निर्मल चंतना में वह निराकार परम सत्ता का अनुभव भी कर पाता है।
आत्मज्ञानी व्यक्ति की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि उसके भीतर किसी भी प्रकार का अभाव नहीं रह पाता है। उसका मन संतुष्ट और शांत होता है। वह बाहरी वस्तुओं के पीछे भागने के स्थान पर अपने भीतर ही स्थित आनंद के स्रोत को पहचान लेता है। उस व्यक्ति की इच्छाएं स्वार्थ से नहीं, बल्कि व्यापक कल्याण की भावना से प्रेरित होती है। इसलिए उसके संकल्पों में अद्भुत शक्ति होती है और उसके जीवन में सहज सफलता आने लगती है।
इसी कारण भारतीय दर्शनों में आत्मज्ञान को मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि माना जाता है। इस प्रकार से जो व्यक्ति स्वयं अपने आप को जान लता है वह व्यक्ति ही सही अर्थों में समस्त संसार को समझ सकता है। सत्य, साधना और आत्मबोध का यह मार्ग केवल आध्यात्मिक उन्नति का ही नहीं, बल्कि संतुलित, शांत और एक सार्थक जीवन जीने का मार्ग है। अंततः वही मनुष्य वास्तविक विजय प्राप्त करता है, जो सत्य को केवल स्वीकार ही नहीं करता, बल्कि उसे अपने जीवन का आधार ही बना लेता है।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
