
अखबार पढ़ने को प्रेरित कर रही सरकार की यह पहल Publish Date : 20/08/2026
अखबार पढ़ने को प्रेरित कर रही सरकार की यह पहल
प्रो0 आर. एस. सेंगर
आज के इस डिजिटल युग में, जहां सोशल मीडिया और स्मार्टफोन ने सूचनाओं के आदान-प्रदान के माध्यमों को काफी हद तक बदल दिया है, वहीं आज भी एक वर्ग अखबार पढ़ने की आदत की परंपरा को संजोए हुए है। दरअसल, जहां लोकतंत्र राष्ट्र-चेतना के साथ समन्वित है, वहां अखबार न केवल समाचार प्रदान करते हैं, अपितु नागरिकों को अपने अधिकारों, कर्तव्यों और नीतियों के प्रति जागरूक, शिक्षित और मुखर भी बनाते हैं।
हालांकि, डिजिटल युग में अखबार की प्रासंगिकता बनाए रखना एक चुनौती भी है और आवश्यकता भी। वैश्विक स्तर पर यदि मूल्यांकन किया जाए, तो अखबार पढ़ने की आदत में औसतन कमी दर्ज की जा रही है, इसके बावजूद यह करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बना हुआ है।
वर्ष 2025 के प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर प्रिंट और डिजिटल मीडिया के समाचार पत्र के प्रकाशनों की कुल आय 125.7 अरब डॉलर के आस-पास थी, जो इसकी वैश्विक स्वीकार्यता को प्रदर्शित करता है। समूचे विश्व में डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभुत्व के कारण दैनिक अखबारों की छपाई और वितरण में औसतन दो प्रतिशत की कमी देखी गई है, परंतु भारत में प्रिंट मीडिया के प्रति रुख वैश्विक आंकड़ों के विपरीत रहा है। ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन (एबीसी) बीसी) के प्राप्त तथ्यों के आधार पर पता चलता है कि बीते दशक में भारतीय समाचारपत्रों और पत्रिकाओं की प्रतियों के वितरण में लगभग दो करोड़, 37 लाख की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अखबारों के प्रकाशन से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों पर निगाह डालें, तो विश्व का सबसे पुराना प्रकाशित हो रहा अखबार इटली का गजेटा डी मंटोवा है, जो 1664 से लेकर आज तक प्रकाशित हो रहा है। द न्यूयॉर्क टाइम्स को संसार का सबसे प्रभावशाली समाचारपत्र माना जाता है। वहीं जापान का अखबार योमियुरी दुनिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला दैनिक अखबार माना जाता है, लेकिन अखबार पढ़ने के दैनिक घंटे को देखें, तो भारत में औसतन 10 घंटे, 42 मिनट के साथ विश्व में प्रथम स्थान रखता है। एक अनुमान के अनुसार, विश्व भर में औसतन 1.5 अरब लोग नियमित रूप से समाचार पत्र पढ़ते हैं।
जहां तक भारत की बात है, तो एबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 के जनवरी से जून की पहली छमाही में ही दैनिक समाचार पत्रों की बिक्री में 2.77 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यहां रोजाना बिकने वाली प्रतियों की संख्या दो करोड़ 97 लाख से अधिक हो गई हैं। पिछले साल की पहली छमाही में उनमें 8,02,272 क़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह वृद्धि अखबारों के प्रति जनता के विश्वास को प्रदर्शित करती है।
अखबार पढ़ने के इन लाभों से सभी अवगत हैं कि यह यह तत्कालीन तत्कालीन घटनाओं की सूचना देने के साथ बौद्धिक व वैचारिक रूप से मजबूत करता है। कई मनोवैज्ञानिक व सामाजिक अध्ययनों में यह सिद्ध हो चुका है कि अखबारों के नियमित अध्ययन करने वाले छात्रों की तर्क शक्ति और वैचारिक क्षमता आम विद्यार्थियों के मुकाबले 20 से 30 प्रतिशत बेहतर होती है। वे सामाजिक व राष्ट्रहित से जुड़े विषयों पर अपने विचार अच्छे से रखते हैं।
अखबार के इस प्रभाव को देखते हुए देश के कुछ प्रमुख राज्यों ने विद्यालय-स्तर पर बच्चों को अखबार पढ़ाने की एक सराहनीय पहल शुरू की है। उत्तर प्रदेश सरकार ने दिसंबर 2025 से राज्य के सभी सरकारी विद्यालयों में दैनिक स्तर पर समाचार पत्र पढ़ना अनिवार्य कर दिया है। शासन के निर्देशानुसार, प्रातः कालीन प्रार्थना-सभा में 10 मिनट का समय अखबार पढ़ने के लिए निर्धारित किया गया है। यह ण्क दूरदर्शी सोच है। इससे स्कूली विद्यार्थी प्रमुख संपादकीय, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समाचारों और खेल से जुड़ी दैनिक गतिविधियों से अवगत होंगे। निस्संदेह, इस पहल से विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के सामान्य ज्ञान में वृद्धि होगी, उनकी शैक्षिक असमानता में कमी लाएगी।
राजस्थान सरकार ने भी जनवरी 2026 से समस्त सरकारी सरकारी स्कूलों में इसे लागू किया है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में भी ऐसी पहल चल रही है, जहां समाचार पत्र पर आश्रित करते हुए छात्रों को मोबाइल स्क्रीन से दूर करने का प्रयास भी किया जा जा रहा रहा है। ऐसे में जाहिर है, कि ऐसे कदम न केवल व्यक्तिगत, बल्कि राष्ट्रीय उत्थान के लिए भी जरूरी हैं।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
