
सावन एवं तीज अब मोबाइल तक ही सिमटकर रह गया Publish Date : 15/08/2026
सावन एवं तीज अब मोबाइल तक ही सिमटकर रह गया
प्रो0 आर. एस. सेंगर
हमें अभी भी याद है कि जब हम बच्चे थे तो, हरियाली तीज से कई दिन पहले ही गली मोहल्लों में झूले घर-घर और पेड़ों पर पड़ने लगते थे। नीम, पीपल और बरगद की मजबूत डालियों पर रस्सियों से झूले बांधे जाते थे। हम बच्चे दूर खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते रहते थे, जबकि मोहल्ले की महिलाएं बड़े प्यार से झूले पर बैठकर पैग बढ़ाती थी। उनकी हँसी किलकिलाहट और सावन के गीतों से पूरा माहौल जैसे जीवंत हो उठता था। कोई महिला अपनी सखी को झूला देती तो कोई गीत की अगली पंक्ति छेड़ देती।
उस समय, तीज सिर्फ एक त्यौहार ही नहीं, पूरे मोहल्ले की सझा खुशी हुआ करती थी। हमें आज भी याद है कि झूला बड़े अमरैया में जैसे गीतों की गूंज दूर दूर तक सुनाई देती थी, सब महिलाएं सज धज कर आती हाथों में मेहंदी रचाती और एक-दूसरे के साथ घंटों बैठकर गीत गाती थी, अब ना वैसे पेड़ बचे हैं, ना ही झूले पड़ते हैं और ना ही वैसा अपनापन कंहीं दिखाई दे रहा है।
आज केवल बाजारों में ही तीज की चमक तो जरूर दिखाई देती है, लेकिन गली मोहल्लों की वह रौनक कहीं खो सी गई है। मोबाइल और सोशल मीडिया ने लोगों को पास पास रहने के बाद भी उन्हें एक दूसरे से भी दूर कर दिया है। जब कभी सावन आता है तो बचपन की वही तस्वीरें आंखों के सामने तैरने लगती हैं। झूले पर पैंक बढ़ाती महिलाएं गूंजते लोकगीत, और गलियों में बिखरी हसीं ठिठोली। वह बेफिक्र हँसी, और वही यादें। आज के समय में तीज हमारी सबसे बड़ी विरासत रह गई है। बुजुर्गों के मुताबिक संयुक्त परिवार और पास पड़ोस के रिश्तों ने त्योहारों को सामूहिक रंग दिया था। तीज के अवसर पर मायके से बेटियों के लिए सिधारा आता है, और महिलाएं एक-दूसरे के घर जाकर मेहंदी लगाती और गीत गाती थी।
नौकरी, पढ़ाई और बेहतर अवसरों के लिए परिवारों के अलग-अलग शहरों में बसने के चलते यह सामूहिकता की भावना भी कमजोर हुई है। तीज का त्यौहार तो आज भी मनाया जा रहा है। लेकिन आज उसका अंदाज बदल गया है। ऐसे में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या आधुनिकता के साथ कदम मिलाते हुए हम सावन के उन लोक गीतों और झूलों की विरासत को भी बचा पाएंगे, जिनमें हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृतियां बसी हुई थी? अब हमें प्रयास करना होगा कि हम अपने आधुनिक जीवन को जीने के साथ ही अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों को बचाकर रखें।
यह समय की मांग है कि नई पीढ़ियों को तीज की परंपरा से जुड़े रहना चाहिए। हरियाली तीज लोक संस्कृति, रिश्तों और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ा हुआ उत्सव माना जाता है। कभी तीज पर घर आंगन से लेकर गली मोहल्लों तक रौनक बनी रहती थी। महिलाएं और युवतियां मिलकर झूला झूलती, सावन के गीत गाती और खुशियां भरती थी। इन गीतों में मायके की यादों के साथ और सावन की उमंग झलकती थी। बुजुर्ग महिलाओं का कहना है कि त्यौहार मनाने का पुराना तरीका बदलने का पूरी तरह खत्म हो चला है। चिंता का विषय है मोबाइल इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में हमारी यह नई पीढ़ी, इन लोक गीतों और सामूहिक आयोजनों से दूर होती जा रही है। कई पुराने सावन गीत अब सिर्फ बुजुर्गों की स्मृतियों में ही शेष रह गए हैं, परंपराओं को बचाने के लिए परिवारों के साथ सामाजिक और महिला संगठनों को भी पहल करनी होगी। तभी हम तीज जैसे महोत्सव को मोबाइल तक सिमटने से बचा सकते हैं।
लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
