कृषि पत्रिकाओं की स्थिति      Publish Date : 27/07/2026

             कृषि पत्रिकाओं की स्थिति

                                                                                                                प्रो0 आर. एस. सेंगर

वर्ष 1550 में गोआ में प्रथम छपाई मशीन के आने साथ वर्तमान काल के पत्र-पत्रिका प्रकाशन का युग प्रारम्भ हुआ और वर्ष 1557 में पहली पुस्तक "Doctrinachristin प्रकाशित हुई। तब से अब तक विभिन्न उद्देश्यों को लेक पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन की प्रक्रिया जारी है। इनमें कृषि एवं ग्रामीण विकास के लिए चलाई जा रही पत्र-पत्रिकान की स्थिति का आकलन करें तो पता चलेगा कि देश में लगत 500 कृषि पत्रिकाएँ पंजीकृत है और इतनी ही संख्या अपंजीकृत कृषि पत्र-पत्रिकाएँ भी विद्यमान हैं।

                                   

यह बात पाना कठिन है कि इनमें कितनी पत्र-पत्रिकाएँ वस्तुतः अस्तित्व में हैं और नियमित रूप से प्रकाशित हो रही है। इनकी कुल संख्या एवं प्रसार संख्या का प्रतिशत देश में प्रकाशित हो रहे कुल समाचार पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में 1 से 2% के मध्य है। परंतु सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि ये पत्रिकाएँ अत्यंत विकेंद्रित हैं और देश के करीब सवा तीन सौ जिला केंद्रों/तहसील केंद्रों से प्रकाशित हो रही है और छोटे क्षेत्र के कृषकों की आवश्यकताओं की पूर्ति में संनद्ध हैं।

कृषि पत्रिकाओं का आकलन

1. कम संख्या और अल्प प्रसार के बाद भी आज कृषि एवं ग्रामीण विकास तथा कृषि तकनीकों के हस्तांतरण के लिए कृषि पत्रिकाएँ ही कृषि तकनीकों के समयबद्ध हस्तांतरण में अधिक सफल सिद्ध हुई है।

2. अत्यंत विकेंद्रीकृत होने के कारण कृषि पत्रिकाएँ स्थान विशेष की समस्याओं पर ज्यादा ध्यान दे पा रही हैं क्योंकि आमतौर पर उनके पाठक विशिष्ट क्षेत्रों में हैं। कन्नड़ की "एकिक पत्रिका" जो पुत्तुर से प्रकाशित होती है, इसका उदाहरण है।

3. ग्रामीण भारत में शिक्षा की स्थिति को देखते हुए अब भी कृषि पत्रिकाओं के सामूहिक वाचन की प्रक्रिया जो स्वभाविक रूप से समूह परिचर्चा का स्वरूप ले चुकी है. अत्यंत कारगर सिद्ध हुई है।

4. मुद्रित होने के कारण उन्हें अपनी सुविधा के अनुसार कभी भी, कहीं भी तथा बार-बार पढ़ने की स्वतंत्रता होती है जो उसे अन्य किसी भी माध्यम से भिन्न बनाती है।

5. किसी भी तकनीक की विस्तृत और संदर्भ सहित जानकारी कृषि पत्रिकाओं के माध्यम से ही प्राप्त हो पा रही है।

कृषि पत्रिकाओं की मुद्रित सामग्री का आकलन व सुझाव

                                  

1. प्रकाशित सामग्री की भाषा अत्यंत सरल, सुपाच्य एवं आम चलन वाली हो। इकाईयाँ भी स्थानीय प्रचलित पद्धति में हो तथा आगत उपयोग की सामान्य अनुशंसा ऐसी हो जिससे पाठकों को ज्यादा जोड़-घटाव करने पर बाध्य न होना पड़े।

2. कृषि शब्दावली के उपयोग में मानक शब्दों का ही प्रयोग हो।

3. प्रकाशित सामग्री की आवश्यकता, मौसम और स्थानीय संसाधनों को ध्यान में रख कर हों।

4 भाषा की त्रुटियों को दूर करने का हर संभव प्रयास हो।

5 कृषि पत्रिकाओं के सामग्री चयन, लेखन एवं अन्वेषण के लिए सुगठित शोध का आधार हो तथा शोध के सतत सहयोग की अवस्था बने।

6. "सफलता की कहानी", "केस अध्ययन आदि से पत्रिका को अधिक रूचिकर बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाए जिससे सामग्री बोझिल न बने।

7. मुद्रित लेखों के मध्य चित्र, कार्टून, ग्राफिक्स का बखूबी उपयोग हो जिससे शब्दों के बोझ की कम अनुभूति हो।

8. पत्रिका के आवरण पृष्ठ को इतना प्रभावी एवं सुंदर बनाया जाए जिससे पाठक प्रथमद्रष्ट्या आकर्षित हों। उदाहरण: इंडियन फार्मर्स डाइजेस्ट, फल-फूल आदि।

9. शब्दों का आकार (Font size) सामान्य पत्र-पत्रिका या अखबारों से बड़ा हो (न्यूनतम 12 प्वांइट) तथा वाक्य में शब्दों की संख्या 14 से ज्यादा न हो। छोटे वाक्य सुग्राह्य होते हैं।

नीतिगत समस्याएँ व सुझाव

1. कृषि पत्रिकाएँ सामान्यतः व्यक्ति विशेष की अभिव्यक्ति ही होकर रह गई है। यहाँ तक कि विश्वविद्यालय व अन्य सरकारी संस्थाओं में भी कृषि पत्रिकाओं के प्रकाशन के लिए अनिवार्य तंत्र का सर्वथा अभाव है। अगर व्यावसायिक पत्रिकाओं से कृषि पत्रिकाओं की तुलना की जाए तो आधारभूत न्यूनतम आवश्यकताओं के मामले में कृषि पत्रिकाएँ नगण्य है जिससे उनकी गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। कृषि पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए इस दिशा में यथोचित कदम उठाने की आवश्यकता है।

2. कृषि पत्रिकाओं के निर्दिष्ट पाठक सामान्यतः कम क्रय शक्ति वाले ग्रामीण है। उन तक पत्रिकाओं को पहुँचाने के लिए शासनीय सहयोग की अति आवश्यकता है।

3. विज्ञापनों की स्थिति कृषि पत्रिकाओं में नगण्य है। नीतिगत निर्णय करके बड़े उद्‌योगों को कृषि पत्रिकाओं के लिए विज्ञापन जारी करने का निर्देश दिया जा सकता है जिससे पत्रिकाओं की प्रसार संख्या बढ़ेगी साथ ही मूल्य भी घटेगा। सरकारी विज्ञापनों के आबंटन में कृषि पत्रिकाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए।

4. अप्रशिक्षित लोगों द्वारा कृषि पत्रिका के संचालन पर नियंत्रण करना चाहिए तथा प्रशिक्षण की उचित व्यवस्था खड़ी की जानी चाहिए। इस क्षेत्र में संलग्न मानव संसाधन के नियमित प्रशिक्षण व उन्नयन की आवश्यकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।