मनुष्यता में कैसा विभाजन      Publish Date : 26/07/2026

             मनुष्यता में कैसा विभाजन

                                                                                                                  प्रो0 आर. एस. सेंगर

अभी हाल ही में पिछले दिनों एक सज्जन मुलाकात हुई और बोले, ‘आपके कुछ व्याख्यान मैंने पढ़े और सुने हैं। मुझे आपका कहना बहुत निषेधात्मक लगा; उसमें कोई मार्गदर्शक सुझाव, जीवन का कोई विधायक मार्ग नहीं है। यह प्राच्य दृष्टिकोण (पूरब के देशों का नजरिया) अत्यंत विनाशकारी है और देखिए, इसने उसे कहां लाकर छोड़ा है? आपका निषेधात्मक रवैया और विशेष रूप से आपका यह आग्रह कि समस्त विचार से मुक्ति आवश्यक है, हम पश्चिमी लोगों को बहुत दिग्भ्रमित करता है, जो स्वभाव और आवश्यकता से उद्यमी रहे हैं। आप जो सिखा रहे हैं, वह हमारी जीवन-प्रणाली के पूर्णतया विरुद्ध है।’

मैंने उनसे कहा कि पूरब और पश्चिम के लोगों के बीच का यह विभाजन भौगोलिक और मनमाना है। उसका कोई मौलिक महत्व नहीं है। हम भले किसी एक रेखा के पूरब या पश्चिम में रहते हों; हम भूरे, काले, गोरे या पीले रंग के हों, फिर भी हम सब मनुष्य ही हैं, जो दुख भोगते और आशा रखते हैं; जो भयभीत हैं और श्रद्धालु भी; उल्लास तथा पीड़ा जैसे यहां हैं, वैसे ही वहां भी हैं। कोई विचार कभी भी पूरब या पश्चिम का नहीं हो सकता, परंतु मनुष्य इसको अपनी संस्कारबद्धता के अनुसार विभाजित कर लेता है। प्रेम भौगोलिक नहीं है, जिसे एक महाद्वीप में पवित्र माना और दूसरे में नकारा जाता है। मनुष्यों के बीच यह विभाजन आर्थिक और शोषण के प्रयोजन से किया गया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि व्यक्ति स्वभाव में या अन्य विशेषताओं में भिन्न नहीं होते; समानता होती है, तो भिन्नता भी रहती ही है। यह सब काफी स्पष्ट और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से तथ्यात्मक है । है न ?

                               

विभिन्नता देखते हुए भी हमें समानता का भान रखना होगा। हमारी बाह्य अभिव्यक्तियां अलग हो सकती हैं और हैं भी, परंतु इन बाहरी रूपों और प्रकटन की पृष्ठभूमि में लालसाएं, दबाव, उत्कंठाएं और भय आदि सब एक जैसे ही हैं। इसलिए ध्यान रखें कि शब्दों से हम ठगे न जाएं। सभ्यताओं में जलवायु, परिस्थिति, भोजन इत्यादि के अनुरूप भेद होता होगा, परंतु पूरे विश्व में संस्कृति मूलतः एक ही है- करुणावान होना, बुराई से दूर रहना, उदार होना, ईर्ष्यालु न होना, क्षमाशील होना इत्यादि ।

‘सभ्यताओं में जलवायु, भोजन इत्यादि के अनुरूप भेद होता होगा, परंतु पूरे विश्व में संस्कृति मूलतः एक ही है- करुणावान होना, बुराई से दूर रहना, ईर्ष्यालु न होना, उदार - क्षमाशील होना।

इस मूलभूत संस्कृति के अभाव में यहां या वहां की कोई भी सभ्यता विघटित अथवा विनष्ट हो जाएगी। तथाकथित पिछड़े लोगों द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है, वे बहुत जल्दी पश्चिम की तकनीकी जानकारी सीख सकते हैं; वे भी युद्ध-पिपासु, जनरल, वकील, पुलिस वाले और यातना गृहों तथा अन्य उपायों के साथ निरंकुश तानाशाह बन सकते हैं। संस्कृति एक पूरी तरह से अलग मसला है। ईश्वर का प्रेम या मनुष्य की स्वतंत्रता इतनी आसानी से सुलभ नहीं है और इनके बिना भौतिक सुख-सुविधाओं का अधिक अर्थ नहीं रहता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।