दूर की जाएं महिला आरक्षण की आशंकाएं      Publish Date : 18/07/2026

  दूर की जाएं महिला आरक्षण की आशंकाएं

                                                                                                                      प्रो0 आर. एस. सेंगर

मोदी सरकार लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की 33 प्रतिशत हिस्सेदारी की संवैधानिक व्यवस्था को शीघ्र लागू करना चाहती है। इस क्रम में नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 आगामी जनगणना के पश्चोत होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू होना है। वर्ष 2027 में जनगणना और 2028 में परिसीमन होगा। इसमें दो वर्ष का समय लगेगा। इस स्थिति में 2030 से ही महिला आरक्षण लागू हो सकेगा और लोकसभा चुनाव में तो 2034 से लागू हो पाएगा। इस हिसाब से महिलाओं को 33 प्रतिशत राजनीतिक हिस्सेदारी देने में 8 से 11 वर्ष का समय लगेगा। ऐसे में, मोदी सरकार परिसीमन की अनिवार्यता से महिला आरक्षण को मुक्त कर उसे जल्द लागू करना चाहती है।

आधी आबादी को विधानसभा एवं लोकसभा में प्रतिनिधित्व देने की यह पहल स्वागतयोग्य है। लागू परिसीमन के अनुसार सभी राज्यों में अभी 4,123 विधायक हैं, जिनमें 392 महिलाएं हैं। 33 प्रतिशत आरक्षण से उनकी संख्या बढ़कर 1,300 से अधिक हो जाएगी। वर्तमान लोकसभा में 75 महिलाएं हैं। आरक्षण के प्रविधान के बाद 2029 के लोकसभा चुनाव में 181 महिलाएं चुनी जाएंगी। यह महिलाओं के राजनीतिकसशक्तीकरण का ऐतिहासिक अवसर होगा। इस बीच यह भी एक प्रश्न है कि क्या आम महिलाओं को इसकी जानकारी है? क्या उन्हें इस अवसर का लाभ उठाने हेतु किसी प्रेरणा, शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था है? कहीं ऐसा न हो कि महिलाओं के लिए आरक्षित स्थान 'केवल राजनीतिक घरानों की महिलाओं से ही भर जाएं? क्या वर्तमान सांसदों, विधायकों, कद्दावर नेताओं के घरों की महिलाएं ही इसका लाभ उठाएंगी? पंचायतों-नगर निकाय में ऐसा ही हुआ। बहुत कुछ निर्भर करेगा कि राजनीतिक दल महिला प्रत्याशियों के चयन में क्या दृष्टिकोण अपनाते हैं। यदि वे केवल जिताऊ महिला प्रत्याशी तलाशेंगे, तो वही होगा जिसकी आशंका है।

                                  

यह भी सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं की हिस्सेदारी केवल उपस्थिति तक सीमित न रहे। वे विधायिका की संरचना, उसकी कार्यप्रणाली, उसे संचालित करने वाले नियम-परिनियम, वाद-विवाद कौशल, नीति-निर्माण की जटिलताओं, सरकार के विभिन्न मंत्रालयों की कार्यप्रणालियों, निर्णयन हेतु वांछित संवैधानिक एवं विधिक ज्ञान, देश-विदेश के गंभीर मुद्दों की समझ और सत्ता पक्ष एवं विपक्ष की लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भी जाने-समझें। वे अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याएं उठाने के साथ हीप्रदेश एवं देश के विकास और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भी अपनी राय रख सकें। नवनिर्वाचित महिला जन प्रतिनिधियों को यह भी समझना होगा कि वे सदन में किसी महिला दल के रूप में काम न कर सकेंगी। संविधान के 52वें संशोधन अर्थात, दल-बदल निरोधक कानून (1985) के कारण वे अपने-अपने दल के निर्देशों से बंधी रहेंगी। उन्हें अपने अपने दल के 'सचेतकों' (व्हिप) के निर्देशों के अनुरूप ही सदन में व्यवहार एवं मतदान करना पड़ेगा। अन्यथा उनकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी।

                               

महिला आरक्षण लागू होने का एक पहलू यह भी होगा इससे प्रत्येक राज्य में पुरुष प्रत्याशियों के लिए उपलब्ध सीटें और विकल्प घट जाएंगे। महिलाएं सभी सीटों से चुनाव लड़ सकती हैं, तो लेकिन पुरुष केवल 'गैर-महिला' सीटों से ही चुनाव लड़ पाएंगे। यह स्थिति सभी दलों के लिए चुनौतीपूर्ण होगी। इससे राजनीतिक दलों में असंतोष और विखंडन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। एक समस्या निर्वाचन आयोग के समक्ष भी आएगी। महिला सीटें आरक्षितकरने हेतु 106वां संशोधन कोई आधार प्रस्तावित नहीं करता, तब आयोग महिला सीटों का निर्धारण कैसे करेगा? अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए निर्वाचन क्षेत्रों के निर्धारण हेतु संविधान में 'सर्वाधिक संख्या' का वस्तुनिष्ठ आधार है। इस संदर्भ में देखा जाए तो महिलाएं तो 'आधी आबादी' हैं, उनके लिए संख्या आरक्षण का आधार नहीं हो सकता। कुछ विपक्षी दल महिला आरक्षण में ओबीसी कोटे की मांग कर रहे हैं, जो असंवैधानिक है। लोकसभा और विधानसभाओं में संविधान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण सुनिश्चित करता है, ओबीसी के लिए नहीं। यदि यह मांग मानी गई तो अन्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। जैसे कि अभी ओबीसी की कोई जनगणना नहीं है। यह जनगणना 2027 में ही होगी। इसमें दूसरा पेच यह फंसेगा कि यदि महिला ओबीसी के लिए आरक्षण हुआ, तो पुरुष ओबीसी के लिए क्यों नहीं? इस मुद्दे पर विपक्ष सरकार कोघेर सकता है। जहां संसद और विधानसभाओं मेंमहिलाओं का बढ़ता प्रतिनिधित्व अत्यंत समावेशी, ऐतिहासिक, समतामूलक समाज की संभावनाओं से परिपूर्ण तो है, लेकिन इसके साथ जुड़ी कुछ शंकाओं को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। पंचायत और नगर निकाय स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व सामान्यतः सांकेतिक होकर रह गया है। संसद और विधानसभा में तो निर्वाचित महिला को ही जाना पड़ेगा। अतः संसद एवं विधानसभाओं में नवागंतुक महिलाओं के लिए शौचालय की सुविधाओं, मासिक-धर्म व्यवस्थाओं, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए निजी-स्थलों की उपलब्धता आदि पर अभी से ध्यान देना पड़ेगा।

संविधान के अनुच्छेद 105 एवं अनुच्छेद 194 द्वारा संसद एवं विधानसभाओं में प्राप्त संसदीय-उन्मुक्तियों की आड़ में होने वाले बेलगाम व्यवहार एवं अमर्यादित भाषाई-अभिव्यक्तियों पर कड़ा रुख अपनाना होगा, ताकि महिलाएं सदन में और सदन के बाहर असहज महसूस न करें। सुनिश्चित करना होगा कि गिरती राजनीतिक संस्कृति और बढ़ती महिला राजनीतिज्ञों की संख्या भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं में यौन उत्पीड़न आदि की किसी आशंका को भी जन्म दे। यदि यह सब सुनिश्चित हो सका, तो न केवल महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलेगा, वरन वे पूर्ण मनोयोग से अपने विधायी उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर सकेंगी, जिससे भारतीय लोकतंत्र गौरवान्वित होगा।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।