
नई पहचान बनाती बेटियां Publish Date : 07/07/2026
नई पहचान बनाती बेटियां
प्रो0 आर. एस. सेंगर
एक समय था जब तकनीक की दुनिया को पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। आइआइटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंचने वाली लड़कियों की संख्या बहुत कम थी, लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। हाल ही में जारी जेईई के परिणाम में पहली बार 10 हजार से अधिक लड़कियों की सफलता इसी बदलाव का एक संकेत है। यह शिक्षा, अवसरों और सामाजिक सोच में आए सकारात्मक परिवर्तन की कहानी है। बेटियां किस तरह नई पहचान बना रही हैं,
जेईई एडवांस्ड (जी) 2026 का परिणाम ऐसे समय में आया है, जब देश में तकनीकी शिक्षा और नवाचार के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। देश के कुल स्टेम (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स) छात्रों में लड़कियों की हिस्सेदारी 42.6% तक पहुंच चुकी है। स्कूलों से लेकर शोध संस्थानों, स्टार्टअप्स और कारपोरेट नेतृत्व तक बेटियां अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। ऐसे में जी में लड़कियों की रिकॉर्ड सफलता को केवल एक परीक्षा परिणाम नहीं, बल्कि बदलते भारत की व्यापक सामाजिक और आर्थिक कहानी के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञ इसे एक बदलाव मानते हैं। उनके अनुसार यह उपलब्धि दर्शाती है कि परिवार अब बेटियों की बौद्धिक क्षमता को गंभीरता से लेने लगे हैं, तभी तकनीकी शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी पिछले कुछ वर्षों से लगातार बढ़ी है। आइआइटी, कानपुर के डायरेक्टर प्रो. मणीन्द्र अग्रवाल कहते हैं कि कुछ वर्ष पहले तक आइआइटी में छात्राओं की हिस्सेदारी 10-12 प्रतिशत के आसपास थी। इस स्थिति को बदलने के लिए सभी आइआइटी में छात्राओं की संख्या 20 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया और सुपरन्यूमरेरी सीटों की व्यवस्था शुरू की गई, जिसका सकारात्मक असर अब दिखाई दे रहा है। इस बार जी एडवांस्ड में 1,87,389 स्टूडेंट्स ने रजिस्ट्रेशन करवाया था, जिनमें से 1,79,694 छात्र-छात्राओं ने परीक्षा दी। कुल विद्यार्थियों में परीक्षा में शामिल होने वाली छात्राओं की संख्या 40,562 थी, जिनमें से 10,107 छात्राओं ने आइआइटी के लिए क्वालिफाई किया है।

बेटी बचाओ से बेटी पढ़ाओ तक:जब 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान शुरू हुआ था, तब उसका लक्ष्य केवल कन्या भ्रूण हत्या रोकना या लड़कियों को स्कूल भेजना नहीं था, बल्कि समाज का सोच बदलना भी था। आज उसके परिणाम कई स्तरों पर दिखाई दे रहे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) में लिंगानुपात सुधार, 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं भी बेटियों को लेकर समाज के बदलते दृष्टिकोण को ही दर्शाता है। यह बदलाव उच्च शिक्षा और विशेष रूप से तकनीकी शिक्षा में भी दिखाई देने लगा है। आइआइटी, जम्मू के डायरेक्टर प्रो. मनोज कुमार गौर मानते हैं कि सरकारी योजनाओं, छात्रवृत्तियों, ऑनलाइन शिक्षा और परिवारों के बढ़ते समर्थन ने मिलकर ऐसा वातावरण तैयार किया है, जिसमें लड़कियां अपनी क्षमता को पहले से कहीं अधिक मजबूती से साबित कर रही हैं।
बढ़ता आत्मविश्वास:आज भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जहां स्टेम शिक्षा में कुल छात्रों में लड़कियों की भागीदारी सबसे अधिक 42.6 प्रतिशत है, जो ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे कई विकसित देशों से अधिक है। आइआइटी मद्रास के '100 स्टार्टअप्स ए ईयर' कार्यक्रम के तहत इनक्यूबेट किए गए 567 से अधिक स्टार्टअप्स में लगभग 25 प्रतिशत स्टार्टअप्स की सह-संस्थापक महिलाएं हैं। ऐसे उदाहरण साबित करते हैं कि तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाली नई पीढ़ी की लड़कियां केवल नौकरी पाने की आकांक्षा नहीं रखतीं।
विकसित भारत की मजबूत नींव:जी में 10 हजार से अधिक लड़कियों की सफलता बड़े बदलाव का प्रतीक है। प्रो. गौर के शब्दों में, यह आंकड़ा संकेत देता है कि भारत अपनी आधी आबादी की क्षमता को व्यर्थ नहीं जाने देगा। आइआइटी पहुंचने वाली ये लड़कियां तकनीक की दुनिया में अपनी जगह बना रही हैं और धीरे-धीरे उस भारत की तस्वीर गढ़ रही हैं जहां बेटियां केवल सपने नहीं देखतीं, बल्कि अवसर भी रचती हैं।
यह सफलता उत्साहजनक है

एडवांस्ड में बड़ी संख्यामें लड़कियों को सफल होते देखना उत्साहजनक है। जब आप अपने आसपास ऐसे लोगों को देखते हैं जो कुछ नया कर रहे हैं तो आपकी सोच भी व्यापक होती है। आइआइटी संस्थानों का माहौल केवल अच्छी नौकरी के बारे में नहीं है, बल्कि रिसर्च, नवाचार और उद्यमिता के बारे में भी सोचने के लिए प्रेरित करता है।
छोटे शहरों की बेटियां बदल रही हैं तस्वीर
इस बदलाव की सबसे प्रेरक कहानी छोटे शहरों और कस्बों से निकल रही है। प्रो. गौर के अनुसार जम्मू, भागलपुर, रायपुर, सिरसा और ऐसे अनेक शहरों से आने वाली छात्राओं में अभूतपूर्व आत्मविश्वास दिखाई देता है। यूट्यूब आधारित निःशुल्क कोचिंग, ऑनलाइन टेस्ट सीरीज और डिजिटल संसाधनों ने भौगोलिक बाधाओं को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। पहले जहां छात्राएं सोचती थीं कि आइआइटी उनके लिए नहीं है, वहीं आज वे न केवल परीक्षा में सफल हो रही हैं, बल्कि शीर्ष रैंक भी हासिल कर रही हैं। यह बदलाव भारत में अवसरों के लोकतंत्रीकरण की कहानी कहता है। हालांकि, चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। प्रो. मणीन्द्र के अनुसार जी जैसी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बड़े कोचिंग केंद्र प्रायः घर से दूर शहरों में स्थित होते हैं। कई परिवार बेटों को तो बाहर भेज देते हैं, लेकिन बेटियों को दूसरे शहर में अकेले रहकर तैयारी कराने को लेकर अब भी सहज नहीं हैं। ऐसे में अनेक प्रतिभाशाली छात्राएं संसाधनों और अवसरों की असमानता का भी सामना करती हैं।
बेटियों के लिए मानसिकता बदली
एक दशक पहले तक ज्यादातर लोगों का सोचना था कि लड़कियों के लिए डॉक्टर बनना ही सही है, लेकिन अब यह मानसिकता दूर हो रही है। इसके तीन मुख्य कारण हैं। पहला, इन्फोसिस, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों में महिलाओं के नेतृत्व के उदाहरण। दूसरा, स्मार्टफोन और इंटरनेट ने छोटे शहरों तक जागरूकता पहुंचाई है और तीसरा, आर्थिक स्वतंत्रता की चाह ने बेटियों को तकनीकी शिक्षा की ओर अग्रसर किया है।
यह है नौकरी देने वाली पीढ़ी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार युवाओं से 'जॉब सीकर नहीं, जॉब क्रिएटर' बनने का आह्वान करते रहते हैं। दिलचस्प बात यह है कि यह सोच तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर रही लड़कियों में दिखाई देने लगा है। देश के स्टार्टअप इकोसिस्टम में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ना भी इसका प्रमाण है। स्टार्टअप इंडिया पोर्टल के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश के लगभग 2.12 लाख मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में से एक लाख से अधिक का संचालन या नेतृत्व महिलाओं द्वारा किया जा रहा है। मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में लगभग आधी कंपनियों में महिला निदेशक या पार्टनर मौजूद हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
