टूटते स्वार्थी दल      Publish Date : 05/07/2026

                    टूटते स्वार्थी दल

                                                                                                                        प्रो0 आर. एस. सेंगर

स्वार्थी लोगों का कोई नियम नहीं होता उनके सभी आचरण अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए होते हैं और उनके नियम भी बदलते रहते हैं। अपने देश का दुर्भाग्य है कि ऐसा आचरण करने वाले लोगों को भी समाज बार बार अपना प्रतिनिधि चुनता है। आज कल विभिन्न राजनैतिक दलों में भगदड़ जैसी मची है, ५ वर्ष पूर्व के बंगाल चुनाव के पहले और बाद में भी राजनेताओं की दौड़ लगी थी।

यह पहली बार नहीं हो रहा है बल्कि स्वाधीनता के बाद से लोकतंत्र को स्वार्थ तंत्र बना कर इस प्रकार के खेल चलते रहे हैं क्योंकि समाज का एक वर्ग जाति और क्षेत्र के आधार पर आँख मूंद कर उनके पीछे खड़ा रहा है। भारतीय राजनीति के अधिकांश दलों की कोई विचारधारा नहीं है, उनके पास देश के भविष्य का कोई सपना नहीं है, अतः उन दलों के लोगों की भी यही स्थिति है। उनके पास भी अपने लिए धन वैभव अपने बच्चों के राजनैतिक भविष्य के अतिरिक्त कोई विचार नहीं है।

                                    

उनके बच्चे भी पिता के नाम पर परिवार के नाम पर और कहीं कहीं तो हद हो गई कि उपनाम (सरनेम) के आधार पर स्वयं को जनता का प्रतिनिधि चुने जाने का आह्वाहन करते हैं इसके लिए खुलकर प्रचार भी करते हैं। कभी कभी ऐसा लगता है कि यह लोकतंत्र कहीं उस राजतंत्र से भी बुरा तो नहीं है जहां राजा तो एक परिवार का होता था लेकिन शक्तियां उसके हाथ में नहीं रहती थी और कभी कभी राज्य की सत्ता पूरी तरह राज परिवार के हाथ से निकल कर किसी और के हाथ में चली जाती थी। चंद्रगुप्त मौर्य, पेशवा उसके उदाहरण हैं। लेकिन यहां तो अनेक राजनैतिक दल शत प्रतिशत व्यक्तिवादी और परिवार वादी ही हैं । स्वार्थ का यह खेल तब तक चलेगा जब तक जनता दलों  की विचारधारा और नेतृत्व को लेकर प्रश्न नहीं पूछेगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।