दृष्टि सकारात्मक रहे      Publish Date : 03/07/2026

                  दृष्टि सकारात्मक रहे

                                                                                                                        प्रो0 आर. एस. सेंगर

जब हम किसी भी मनुष्य, मनुष्यों के समूह अर्थात परिवार या फिर समाज को निराश देखते हैं तब यह चिंतन स्वाभाविक होता है कि इस निराशा का कारण क्या है? अधिकांश समय में इस प्रश्न का जो उत्तर मिलता है वह निराशा के लिए पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि निराशा का बड़ा कारण उस व्यक्ति या परिवार की दृष्टि का नकारात्मक होना होता है। यदि हम विचार करें कि हमारे पास संसाधन के रूप में प्रकृति ने क्या प्रदान किया है? यह संसाधन हमारे पास सुरक्षित हैं क्या? तब यह ध्यान में आता है अपना यह शरीर अपनी बुद्धि अपना साहस अपना धैर्य यह सब प्रकृति ने हमें संसाधन के रूप में प्रदान किया है।

                                     

इसकी अतिरिक्त बाकी सब परिस्थितियों और पुरुषार्थ के कारण हमने अर्जित किया है। परिस्थितियां सदैव एक जैसी नहीं रह सकती और पुरुषार्थ भी सब एक जैसे नहीं कर सकते तो फिर अपने प्राकृतिक संसाधनों के अतिरिक्त जो हमें प्राप्त हो रहा है उसकी तुलना किसी अन्य से कैसे की जा सकती है? यदि तुलना करनी भी है तो हम उनसे क्यों ना करें जो हमसे अधिक पुरुषार्थ करके भी विपरीत परिस्थिति होने के कारण हमसे कम परिणाम प्राप्त कर रहे हैं। यह संख्या भी थोड़ी नहीं है बल्कि समाज और संसार में यह संख्या बहुत बड़ी है। किसी पैमाने पर कोई आगे है तो किसी दूसरे पैमाने पर कोई और, यह स्थिति प्रत्येक मनुष्य परिवार और राष्ट्रों के साथ है।

जिन पैमानों पर हम आगे हैं उनका विचार करने से मन प्रसन्न रहता है, कार्य करने का उत्साह बना रहता है लेकिन जैसे ही हम केवल उनके विचार शुरू करते हैं जिन पैमानों पर हम थोड़े पीछे हैं तो तुरंत ही निराशा हमें घेरना प्रारंभ कर देती है और हम भी आगे बढ़ने की शक्ति को व्यर्थ में गंवाना शुरू कर देते हैं। इसका आशय है बिल्कुल भी नहीं है कि जिन क्षेत्रों में हम पीछे हैं उसका विचार ही ना करें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।