
प्रकृति हितैषी भारतीय जीवनशैली Publish Date : 01/07/2026
प्रकृति हितैषी भारतीय जीवनशैली
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य
पर्यावरण संरक्षण भारत के लिए कोई नया विषय नहीं है, बल्कि यह हमारी परंपरा और जीवन-पद्धति का हिस्सा रहा है। इसका प्रमाण हमारी धार्मिक गतिविधियों, परंपराओं, रीति-रिवाजों और दैनिक जीवन के व्यवहार में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। भारतीय संस्कृति पृथ्वी को केवल भौतिक संसाधन नहीं मानती, बल्कि उसे मां के रूप में पूजती है। जंगल, वन्यजीव, वनदेवता और प्रकृति के विभिन्न स्वरूप हमारी प्राचीन सभ्यताओं तथा धार्मिक मान्यताओं में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन मान्यताओं के कारण अनेक पौधों और पशु-पक्षियों को धार्मिक आस्था से जोड़कर संरक्षण प्रदान किया जा रहा है। जैसे पीपल, नीम, केला तथा अन्य अनेक वृक्षों को पूजनीय माना गया है। प्राचीन काल से ही ऐसे वृक्ष मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर लगाए जाते रहे हैं। इसी प्रकार अनेक पशु-पक्षियों को भी धार्मिक मान्यताओं के कारण विशेष सम्मान प्राप्त है। अधिकांश हिंदू देवी-देवताओं को किसी न किसी पशु या पक्षी के साथ दर्शाया गया है। ये मानव और प्रकृति के गहरे संबंध को भी व्यक्त करते हैं। यह सब दर्शाता है कि जंगल, पृथ्वी, आकाश, जल, वायु और अग्नि जैसे प्राकृतिक तत्व हमारी सभ्यता, संस्कृति और जीवन-दर्शन का अभिन्न अंग रहे हैं।

भारतीय पर्यावरण संरक्षण का दृष्टिकोण केवल व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, धार्मिक और नैतिक मूल्यों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यही परंपरा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भारत को विश्व के अन्य देशों से अलग पहचान प्रदान करती है और प्रकृति के साथ हमारी एक टिकाऊ तथा संतुलित संबंध स्थापित करती है। यह भावना लोगों के संस्कारों और जीवनशैली में रची-बसी है, जिसे वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाते चले आ रहे हैं। वेद मानवता की ज्ञान-परंपरा के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। इनमें भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के विषयों का वर्णन मिलता है। इस दृष्टि से वेद समग्र ज्ञान के स्रोत हैं। उगते हुए सूर्य, प्रभात की लालिमा, प्रकृति की निस्तब्धता और उसकी मधुरता का जितना सुंदर और संवेदनशील चित्रण वेदों में मिलता है, वैसा उदाहरण विश्व साहित्य में दुर्लभ है।
वेदों में जीवन और प्रकृति को एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ माना गया है। वहां प्रकृति केवल भौतिक संसाधन नहीं; बल्कि जीवन की सहचरी और प्रेरणा-शक्ति के रूप में प्रस्तुत है। यही कारण है कि वेद और आधुनिक विज्ञान को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जा सकता है।
पर्यावरण विज्ञान और जीव विज्ञान, दोनों आधुनिक विज्ञान की महत्वपूर्ण शाखाएं हैं, जिनके अंतर्गत पर्यावरण के भौतिक, रासायनिक और जैविक घटकों के बीच होने वाली पारस्परिक क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। यद्यपि इन वैज्ञानिक विषयों का औपचारिक विकास 20वीं सदी में हुआ, किंतु इनके मूल तत्वों की झलक वैदिक साहित्य और प्राचीन भारतीय चिंतन में भी देखी जा सकती है। पर्यावरण की अवधारणा 'समय के साथ बदलती रहती है, क्योंकि यह उस समय की सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के अनुसार पर्यावरण में जल, वायु और भूमि के साथ-साथ उनके तथा मानव, अन्य जीवित प्राणियों, पौधों, सूक्ष्मजीवों और संपत्ति के बीच विद्यमान पारस्परिक संबंध भी शामिल हैं। इस परिभाषा के आधार पर कहा जा सकता है कि पर्यावरण के दो प्रमुख घटक हैं- जैविक और अजैविक। जैविक घटकों में मनुष्य, पशु-पक्षी, वनस्पतियां और सूक्ष्मजीव शामिल हैं, जबकि जल, वायु, मिट्टी, प्रकाश और खनिज जैसे तत्व अजैविक घटकों के अंतर्गत आते हैं।
आधुनिक विज्ञान को इन परस्पर संबंधों की व्यापकता को समझने में लंबा समय लगा। जबकि वैदिक युग में लोग इसे पहले ही समझ गए थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जंगलों और पर्यावरण संरक्षण के संबंध में राजा के कर्तव्यों का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि शासक का दायित्व केवल जंगलों की रक्षा करना ही नहीं, बल्कि नए वनों की स्थापना और संरक्षण सुनिश्चित करना भी है। सम्राट अशोक ने कुछ विशेष पशुओं की सूची जारी की थी, जिनके शिकार पर प्रतिबंध लगाया गया था।
हिंदू अनुष्ठानों में प्रायः शांति मंत्रों का पाठ किया जाता है, जिनका मूल स्रोत वेद हैं। इन मंत्रों में समस्त सृष्टि के लिए शांति, संतुलन और कल्याण की कामना की जाती है। शांति मंत्रों में अंतरिक्ष में शांति, पृथ्वी पर शांति, जल में शांति, वनस्पतियों में शांति, वृक्षों में शांति, मध्य क्षेत्र में शांति तथा समस्त दैवी शक्तियों और ब्रह्मांडीय तत्वों में शांति की प्रार्थना की जाती है। अंत में यह कामना की जाती है कि वही शांति हमारे भीतर भी स्थापित हो। इन मंत्रों में सभी प्राकृतिक शक्तियों और सृष्टि के विभिन्न घटकों के बीच समन्वय, संतुलन और सद्भाव की भी भावना निहित है। सभी के सामूहिक कल्याण के लिए आज यही दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में जब विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है, तब भारतीय परंपराओं में निहित पर्यावरणीय दृष्टिकोण मानवता को प्रकृति के साथ संतुलित और सतत जीवन जीने की महत्वपूर्ण सीख देता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
