
सुपर अल-नीनो का खेती पर प्रभाव Publish Date : 30/06/2026
सुपर अल-नीनो का खेती पर प्रभाव
प्रो0 आर. एस. सेंगर
सुपर अल-नीनो के खेती पर प्रभाव पर सोसाइटी ऑफ़ ग्रीन वर्ड फॉर सस्टेनेबल एनवायरनमेंट के सचिव और सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ0 आर. एस. सेंगर ने बताया कि कम बारिश से दालों की बुवाई को सबसे बड़ा झटका लगा है। दलहन का कुल रकबा पिछले साल के 2.37 लाख हेक्टेयर से घटकर 1 .55 लाख हैक्टेयर रह गया इसमें 1.18 लाख हेक्टेयर की कमी आई है मूंग सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। पिछले साल के 1.54 लाख हैक्टेयर के मुकाबले इस बार सिर्फ़ 0.69 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई है। इस बार अरहर की बुआई 0.21 लाख हेक्टेयर से घटकर 0.09 लाख हेक्टेयर रह गई। उड़द का रकबा भी 0.35 लाख हेक्टेयर से घटकर 0.27 लाख हेक्टेयर रह गया है। नकदी फसलों में कपास की बुआई में सबसे बड़ी 3.66 लाख हेक्टेयर की गिरावट देखने को मिली है। रकबा 13.19 लाख हेक्टेयर से घटकर 9.53 लाख हेक्टेयर रह गया है।

डॉ॰ आर. एस. सेंगर ने बताया कि जून के शुरुआती दिनों में होने वाली बारिश का खरीफ फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण स्थान होता है। ऐसे में सब्जियों की फसलें खासतौर से लौकी, करेला, तोरेई, भिंडी और ग्वार फली जैसी हरी सब्जियों के साथ-साथ मक्का, अरहर और बाजरा, ज्वार जैसी फसलों की बुआई और उत्पादन प्रभावित हो सकते हैं।
सुपर अल-नीनो का असर वर्ष 2015 जैसा दिख सकता है
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस वर्ष उत्तर प्रदेश में अल नीनो का प्रभाव वर्ष 2015 जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। आंकड़ों के मुताबिक 2015 मैं जून से सितंबर के दौरान देश में सामान्य से केवल 86 से 91% कम वर्षा दर्ज हुई थी। कम बारिश से धान और मक्का जैसी खरीफ फसलें प्रभावित हुई थीं, जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा और खाद महंगाई बढ़ी थी। प्रदेश ही नहीं, देश भर में इस बार मानसून की गति शुरुआती दौर में ही ऐसी थम गई है कि 15 जून तक देश के 703 जिलों में से महज 103 जिलों में ही सामान बारिश हो पाई है। इस बार अभी अकेले महाराष्ट्र में ही 74 फीसदी कम बारिश हुई है। भारत में खेती 50 से 60 फीसदी सिंचाई वर्षा पर ही आधारित है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
