ग्लोबल वार्मिंग और मानवता      Publish Date : 26/06/2026

           ग्लोबल वार्मिंग और मानवता

                                                                                                      प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं अन्य

कार्बन उत्सर्जन में कमी न होने की स्थिति में क्या होगा? जाहिर है जल संकट बढ़ेगा, बीमारियां सुरसा के मुंह की भांति बढ़ेंगी, खाद्यान्न उत्पादन में कमी आएगी, ध्रुवों की बर्फ तेजी से पिघलेगी, समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ेगा, नतीजतन दुनिया के कई देश पानी में डूब जाएंगे, समुद्र किनारे सैकड़ों की तादाद में बसे शहर-महानगर जलमग्न तो होंगे ही, तकरीबन 20 लाख से ज्यादा तादाद में प्रजातियां सदा-सदा के लिए खत्म हो जाएंगे। महात्मा गांधी ने 1928 में ही उत्पादन और खपत के पश्चिमी मॉडल के चलते वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय असंतुलन की चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था, 'ईश्वर कभी नहीं चाहता कि भारत कभी पश्चिम की तरह औद्योगिकीकरण को अपनाये।' यही नहीं उन्होंने यह भी कहा, 'एक छोटे से द्वीप साम्राज्य (इंग्लैंड) के आर्थिक साम्राज्यवाद ने आज दुनिया को जंजीरों से जकड़ रखा है। यदि तीस करोड़ की आबादी वाले देश ने ऐसा आर्थिक शोषण किया तो पूरी दुनिया टिड्डियों की तरह बेकार हो जायेगी।' उनका मानना था और वह यह भलीभांति जानते-समझते थे कि देश को आजादी के बाद गरीबी के खात्मे और देशवासियों के सम्मानजनक जीवनयापन की दृष्टि से आर्थिक रूप से विकास करना ही होगा। उनके अनुसार भारत में पश्चिम की तुलना में आबादी का घनत्व अधिक है और नियंत्रण-शोषण के लिए उसके पास कोई उपनिवेश नहीं है, भारत को अपने प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के प्रति कहीं अधिक जिम्मेदारी दिखानी होगी और पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचाना होगा जिसपर हर तरह का जीवन विशेषकर मानव जीवन निर्भर है।

                                  

दुखद यह है कि आज़ाद भारत की सरकारों ने गांधी जी के विचारों को पूरी तरह बिसार दिया और न जाने किस दर्द और ज्ञान के आलोक के मोहपाश में बंधकर भारतीय सच्चाइयों से परे संसाधन और ऊर्जा के सघन निर्बाध दोहन की नीतियों को अपनाया। इसका दुष्परिणाम स्वरूप जहां एक ओर मानव जीवन प्रभावित हुआ, संसाधनों पर कॉर्पोरेट घरानों के कब्जे से ग्रामीण और आदिवासी समाज बेदखली का शिकार हुआ और औद्योगिक कारखानों को प्रोत्साहन दिए जाने वाली परियोजनाओं के चलते प्रदूषण की समस्या ने भयावह रूप अख्तियार कर लिया। वह बात दीगर है कि इस तबाही के विरोध में देश में चिपको, नर्मदा और महुआडांड़ के आंदोलन सामने आए। इसके उपरांत देश में पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना हुई और पारिस्थितिक नुकसान को रोकने की खातिर बहुतेरे कानून भी बने। लेकिन हुआ क्या? उसके बाद के दशकों में देश की सत्ता पर काबिज सरकारों ने समाज के व्यापक हित की अपेक्षा निजी कॉर्पोरेट घरानों के शरणागत होना ज्यादा उचित समझा। वैश्विक स्तर पर देखें तो आज से बीस बरस पहले हम सालाना आठ अरब मीट्रिक टन कार्बन वायुमंडल में छोड़ रहे थे, जिसका आंकड़ा बढ़ कर आज डेढ़ गुणा से भी काफी ज्यादा हो गया है। इसके कारण धरती का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके कारण आज मानव खुद विनाश के कगार पर खड़ा है। यही वजह है कि आज समूची दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा जोरों पर है जो आज पूरी दुनिया के लिए एक चिंताजनक और शोचनीय समस्या है। इससे प्रकृति का मिजाज बदल रहा है। इसमें जलवायु परिवर्तन ने अहम भूमिका निभाई है। संयुक्त राष्ट्र ने जलवायु संकट को लेकर जारी चेतावनी में कहा है कि जलवायु लक्ष्यों के पूरा होने की उम्मीद न के बराबर है। संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक का कहना है कि दावा कुछ भी किया जाए, हकीकत में दुनिया में ऊर्जा की जरूरत पूरा करने के लिए कोयला, तेल और गैस का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। इससे होने वाले उत्सर्जन से जलवायु लक्ष्यों की पूर्ति नहीं हो सकती।

                                    

कार्बन उत्सर्जन में कमी न होने की स्थिति में क्या होगा? जाहिर है जल संकट बढ़ेगा, बीमारियां सुरसा के मुंह की भांति बढ़ेंगी, खाद्यान्न उत्पादन में कमी आएगी, ध्रुवों की बर्फ तेजी से पिघलेगी, समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ेगा, नतीजतन दुनिया के कई देश पानी में डूब जाएंगे, समुद्र किनारे सैकड़ों की तादाद में बसे शहर-महानगर जलमग्न तो होंगे ही, तकरीबन 20 लाख से ज्यादा तादाद में प्रजातियां सदा-सदा के लिए खत्म हो जाएंगे। खाद्यान्न संकट होगा सो अलग। सबसे बड़ी बात यह कि सदियों से जीवन के आधार रहे खाद्य पदार्थों के पोषक तत्व कम हो जाएंगे। खाद्य पदार्थ में पाये जाने वाले बी-1, बी-2, बी-5 और बी-8 जैसे विटामिनों में खासी कमी आएगी। हालात की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि यदि धरती का तापमान दो गुणा से और बढ़ गया तो धरती का एक चौथाई हिस्सा रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगा। दुनिया का 20-30 फीसदी हिस्सा सूखे का शिकार होगा। नतीजतन दुनियाभर में तकरीबन 150 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे। जंगलों में आग की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोतरी होगी। इसका सबसे ज्यादा असर भारत समेत दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण यूरोप, मध्य अमेरिका व दक्षिण ऑस्ट्रेलिया पर पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणाम का एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि पहले बीते चार दशकों से ही कम हो चुकी उर्वरा शक्ति वाली जमीन की सेहत बिगड़ने की दर अब सौ गुणा ज्यादा हो गयी है। अच्छी गुणवत्तापूर्ण खेतिहर जमीन बंजर होने की ओर अग्रसर है। उस हालत में भविष्य में दुनिया की बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए दूसरे संसाधनों पर निर्भर होना पड़ेगा और आने वाले 24 सालों में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका को इस चुनौती का भीषण सामना करना पड़ेगा। इन इलाकों में सदी के अंत तक तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच जाएगा। इसका सीधा असर खाद्यान्न, पेयजल और प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ेगा। नतीजतन आम आदमी का जीना मुहाल हो जायेगा और लोग ठंडे प्रदेशों की ओर कूच करने को विवश होंगे।

आईपीसीसी की रिपोर्ट ने मौसम की चरम स्थितियों जैसे बाढ़, सूखा, मौसम के बदलते मिजाज, तूफान, ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और उससे बनी झीलों, जंगलों में लगने वाली विनाशकारी आग तथा ऐसी ही अन्य अप्रत्याशित घटनाओं पर दुनिया का ध्यान केंद्रित किया है जिनका असर आज समूची दुनिया पर साफ तौर पर दिखाई पड़ रहा है। प्रकृति के सारे उतार-चढ़ाव मानवता को संभालने के लिए प्रकृति का इशारा हैं। यह भी कि आधुनिक सभ्यता के इतिहास में पर्यावरण तेजी से बदल रहा है। लेकिन हम लोग इनको समझने और गंभीरता से लेने के बजाय नजरंदाज कर रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में आज सारी मानवता है। इसलिए हमें कुछ करने से पहले यह सोचना होगा कि हम धरती को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं और इसके जिम्मेदार भी हम ही हैं। क्योंकि यह भयावह स्थिति इंसान के लोभ और भोगवादी संस्कृति में आमूलचूल लिप्त होने का ही नतीजा है। यह भी तय है कि धरती के गर्म होने के परिणाम बेहद गंभीर होंगे। इससे अर्थ-व्यवस्था, पारिस्थितिकी और स्वास्थ्य पर अकल्पनीय दुष्प्रभाव पड़ेंगे। गांधी जी ने कहा था कि -पृथ्वी के पास मानव की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी कुछ है। यदि हम इस बात को गंभीरतापूर्वक लें, इस दिशा में ईमानदारी से प्रयास करें और अपनी जीवनशैली में बदलाव लाकर प्रकृति से सामंजस्य कर प्रकृति के प्रहरी बनें तो इससे मानवता के साथ-साथ धरती पर रहने-बसने-जीने वाले तमाम जीव-जंतु और धरती को विनाश से बचाने में कामयाब हो सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।