
धर्म का मर्म Publish Date : 25/06/2026
धर्म का मर्म
प्रो0 आर. एस. सेंगर
धर्म एक ऐसा विशाल छत्र है, जिसकी छाया में पूरा संसार क्रियाशील है। यह धर्म ही है, जो जगत को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए एक अदृश्य संविधान के रूप में पूरे संसार में व्याप्त है। यही अनंतकाल से भौतिक संसार को निर्बाध रूप से बांधे हुए है। धर्म की विकृत तथा संकुचित परिभाषा ने हमें यह विश्वास दिला दिया है कि धर्म का अभिप्राय मात्र किसी मत या पंथ से है। परन्तु वास्तविकता तो यह है कि धर्म वह अटल एवं शाश्वत सिद्धांत है, जिसके माध्यम से संसार की हर क्रिया संचालित होती है।

जिस प्रकार से ग्रहों का धर्म है एक निश्चित गति पर सूर्य की परिक्रमा करना, ऋतुओं का धर्म है अपने स्वभाव अनुसार फल देना, वृक्ष का धर्म है छाया तथा फल देना। संपूर्ण प्रकृति धर्मोचित व्यवहार ही करती है। पशु भी अपनी शारीरिक संरचना के अनुसार अपने धर्म का पालन करते हैं।
मानव के सन्दर्भ में धर्म का मर्म बहुत अधिक व्यापक है। मानव के अतिरिक्त संपूर्ण जगत का धर्म एक धुरी से बंधा हुआ है, किंतु मानव का धर्म और व्यवहार देश-काल एवं परिस्थिति के सापेक्ष ही होता है। उसे इस कसौटी पर खरा भी उतरना है, क्योंकि यदि व्यक्ति परिस्थिति के अनुरूप धर्मोचित व्यवहार न करे तो वह अधर्म है। इस कारण भी कि मानव के पास ही वह विवेक है जो तय करता है कि उसके लिए किस समय क्या धर्म है। यहां प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि धर्म का अनुपालन आवश्यक क्यों है? वस्तुतः, धर्म ही वह महीन रेखा है जो उचित तथा अनुचित को अलग करती है। इसके अभाव में समाज अनियंत्रित होकर पशुवत हो जाएगा।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का समग्र जीवन एक आदर्श धर्मोचित जीवन का जीवंत उदाहरण है। तभी हम कहते हैं ‘रामो विग्रहवान धर्मः’ अर्थात राम ही धर्म का विग्रह स्वरूप हैं। अतः जीवन में धर्म का पालन कर्तव्य से मुक्ति के लिए आवश्यक है। महाभारत की शिक्षा है ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ अर्थात जहां धर्म है, वहीं विजय है और विजयश्री का आलिंगन धर्म की परिधि में ही संभव है। धर्म ही उत्थान है और अधर्म पतन का कारण बन जाता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
