
उत्पाती होते बच्चों की मानसिकता Publish Date : 24/06/2026
उत्पाती होते बच्चों की मानसिकता
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं मुकेश शर्मा
बचपन से ही बच्चों को आक्रमकता के बुरे परिणामों के सम्बन्ध में उन्हें सचेत किया जाए। ‘टिट फॉर टेट’ अर्थात जैसे को तैसा के पाठ को न पढ़ाते हुए बच्चों को इस प्रकार की स्थितियों को सही तरीके से हैंडल करना सिखाएं। उन्हें अपने टीचर, प्रिसिपल और पेरेन्ट्स आदि से शिकायत करने की सलाह दें, बजाय इसके कि वह स्वयं ही मारपीट करके हिसाब को बराबर करने के, क्योंकि इस प्राकर के यह हिसाब मारपीट से कभी भी बराबर नहीं हो पाते हैं। इसके लिए अपने बच्चे पर शुरूआत से ही नजर बना रखें। ऐसे में यदि आपको अपना बच्चा नार्मल बरताव से हटकर बरताव करता हुआ लगता है तो आपको बच्चे के प्रति सावधान हो जाना चाहिए, क्योंकि किसी भी बच्चे का आक्रामक होना अपने आप में चिंता का विषय होता है।

बच्चों का अधिकतम समय शिक्षा ग्रहण करते हुए क्लास रूम में ही व्यतीत होता है, जहाँ उसका अपने क्लासमेट्स के साथ इंटर एक्शन एक लम्बे समय तक चलता रहता है। प्रत्येक बच्चा अपने जींस एवं संस्कारों के अनुरूप ही ढलता है, लंकिन बच्चों की मानसिकता पर वातावरण का प्रभाव इमिडिएट पड़ता है, उसे भी अनेदेखा नहीं किया जा सकता। यह बात तो हम सभी लोग अच्छी तरह से समझते हैं कि सिनेमा और टीवी का प्रभाव हमारे बच्चों पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
ग्लैमर की चकाचौंध, ऐशपूर्ण जीवन, स्वच्छन्दता, उद्वंड़ता, बड़ों के द्वारा दी गई सीख की अवहेलना करना और अपनी मनमर्जी को चलाना आज के बच्चों के लिए सहज व्यवहार होता है। आज के समय में बच्चों के अंदर धैर्य, अपितु यदि इस प्रकार से कहा जाए कि वर्तमान कल्चर में धर्य नहीं है तो यह कतई भी गलत नहीं होगा। ऐसे समय में जब कि बड़ों में ही र्धर्य का गुण नहीं है तो फिर बच्चों में इस गुण के होने की कल्पना किस प्रकार से की जा सकती है। आज के समय में रोड रेज के किस्से भी काफी बढ़ चुके हैं और यही हाल क्लास रेज का भी है।

क्लास के अंदर बुली करना, दादागिरी दिखाने के किस्से तो टॉम जोंस और चार्ल्स डिंकस के जमाने से ही चले आ रहें हैं, परन्तु वर्तमान समय में इसका स्वरूप लगभग सारी हदें पार कर चुका है। आज गर्लफ्रेंड या पैसों के चक्कर में लड़के अपने साथ पढ़ने वालों की जान तक ले रहें हैं। कभी कोई मामूली सी कहासुनी किसी बढ़े झगड़े को जन्म दे देती है। आयु के इस पड़ाव पर लड़कों में परिपक्वता की कमी होती है और खून गर्म होता है, जोश में वह अपना होश खो बैठते हैं और कभी-कभी तो वह कुछ ऐसा कर गुजरते हैं कि जिसके चलते कई जिन्दगियाँ एक साथ ही बर्बाद हो जाती हैं और उनका अपना भविष्य तो अन्धकार में डूब ही जाता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
