
भूजल को जहरीला होने से बचाना विकट चुनौती Publish Date : 04/06/2026
भूजल को जहरीला होने से बचाना विकट चुनौती
प्रो0 आर. एस. सेंगर
भजल में मिलावट की समस्या लगातार बढ़ रही है। केंद्र सरकार भी मानती है कि भारत के कई हिस्सों का भूजल कई जहरीले रसायनों के मिलावट की वजह से पीने लायक नहीं रह गया है। पेय जल की उपलब्धता और इसकी गुणवत्ता से जुड़े केंद्र सरकार के विभागीय तंत्र के आंकड़े बताते हैं कि सेहत के लिए खतरनाक रसायनिक तत्वों की मिलावट वाले दूषित पानी की उपलब्धता से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में राजस्थान, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और असम हैं। यह दायरा लगातार बढ़ रहा है। पर्यावरण मंत्रालय की मदद से केंद्रीय एजेंसी एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली (आईएमआईएस) द्वारादेश में पानी की गुणवत्ता को लेकर तैयार किए आंकड़ों के मुताबिक राजस्थान की सर्वाधिक 19658 वस्तियां और इनमें रहने वाले 77.75 लाख लोग जहरीले पानी पीने की वजह से प्रभावित हैं। आईएमआईएस द्वारा पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश में 70740 बस्तियां फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौह तत्व और नाइट्रेट सहित दूसरे लवण एवं भारी धातुओं के मिश्रण वाले दूषित जल से प्रभावित हैं।

इस जहरीले पानी से सीधे-सीधे 47.46 करोड़ आबादी प्रभावित है। राजस्थान में फ्लोराइड, नाइट्रेट और लवणयुक्त भूजल का प्रकोप सबसे ज्यादा है। राज्य में 5998 बस्तियों के 40.98 लाख लोग फ्लोराइडके, 12606 बस्तियों में रहने वाले 28.55 लाख लोग लवणयुक्त पानी के और 1054 बस्तियों के 8.20 लाख लोग नाइट्रेट मिश्रित पानी के इस्तेमाल के लिए मजबूर हैं। वहीं पर असम के भूजल का बहुत बड़ा हिस्सा आर्सेनिक के मिश्रण की वजह से इस्तेमाल के काबिल नहीं रह गया है। एक आंकड़े के मुताबिक असम की 4518 बस्तियों में रहने वाली 18 लाख की आबादी को आर्सेनिक युक्त पानी पीना पड़ रहा है। इससे कैंसर, हृदय संबंधी बीमारियों और पेट की बीमारियों से लोगों को दो-चार होना पड़ रहा है। राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है- असम के सभी लोगों को साफ और शुद्ध पानी मुहैया कराने की।
असम सरकार ने इस दिशा में कुछ कोशिशें की हैं लेकिन भूजल के प्रदूषित होते जाने में कोई ऐसा कदम अभी नहीं उठाया गया है जिससे राज्य के सभी लोगों को साफ और शुद्ध पीने लायक पानी मिल पाए।
पाताल के पानी की अशुद्धता की समस्या वर्षों से बनी हुई है। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में पीने लायक शुद्ध पानी मिलना किती चुनौती से कम नहीं है। भारत में महज तीस प्रतिशत लोगों को पीने लायक पानी उपलब्ध है। उत्तर और दक्षिण भारत के अनेक इलाकों में भूजल में कई तरह के रसायनों के मिश्रण की वजह से शुद्ध पानी की उपलब्धता कठिन होती जा रही है। इस दिशा में सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञान लेकर जल मंत्रालय और राज्य सरकारों को ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया था लेकिन समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। गुजरात के कच्छ, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, असम, कर्नाटक, हरियाणा, पंजाब, पूर्वी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भूजल मिश्रण की समस्या विकराल होती जा रही है।
राजस्थान जहां साल के बारहों महीने पानी की किल्लत बनी रहती है, वहां के भूजल में कई जहरीले तत्व मिश्रित पाए गए हैं। राजस्थान के कई जिलों में लोगों को कई किमी पैदल चलकर पीने का पानी मिलता है, वह भी रसायनिक तत्वों के मिश्रण से युक्त।भारत की 30 करोड़ आबादी को पाताल का अशुद्ध पानी पीना पड़ रहा है जिसमें उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र, मेरठ, जौनपुर, बस्ती सहित अनेक जिलों में आर्सेनिक और दूसरे रसायनिक तत्वों का मिश्रण भूजल में पाया गया है। चंडीगढ़ स्थित लेबीरेटरी के परीक्षण के अनुसार दिल्ली में ज़मीन के नीचे के पानी में क्लोराइड की मात्रा तय सीमा से बहुत अधिक 1000 फीसदी तक पाई गई। इसी तरह कैल्शियम, मैग्नीशियम, कॉपर, सल्फेट, नाइट्रेट, फ्लोराइड, फेरिक (लोहा) और कैडमियम की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है।
इन तत्वों से युक्त पानी पीने से हृदयाघात, किडनी पर बुरा असर, लीवर का संक्रमण, गैस्ट्रिक कैंसर, दांत संबंधित बीमारियां, तंत्रिका तंत्र सिस्टम पर बुरा असर, त्वचा संबंधी रोग, तनाव, अस्थमा, यॉयरायड, डायरिया और आंख संबंधी अनेक समस्याएं बहुलता से देखी जा रही हैं। दिल्ली में जो पानी हरियाणा से पीने के लिए मिलता है, वह भी शुद्धता के तय मानके के अनुरूपनहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने भूजल के प्रदूषित होने के मद्देनजर बड़ी औद्योगिक इकाइयों को बंद करने या आबादी से दूर स्थापित करने का आदेश दिया था जिसका पालन राज्य सरकारों ने किया, लेकिन आज भी दिल्ली, कोलकाता, मुम्बई, हरिद्वार, फरीदाबाद, गुरुग्राम और दूसरे तमाम शहरों में औद्योगिक गतिविधियां जारी है जिस पर तत्काल गौर करने की जरूरत है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आर्सेनिक का अधिकतम सुरक्षित स्तर 10 पार्ट्स प्रति बिलियन (पीपीबी) माना है। गौरतलब है, दुनिया के 15 करोड़ लोग नियमित रूप से इससे अधिक आर्सेनिक युक्त पानी पी रहे हैं। भारतके अलावा बांग्लादेश, अमेरिका सहित दुनिया के ऐसे तमाम देश हैं जहां आर्सेनिक, नाइट्रेट एवं कुछ खास तरह के लवण भूजल में घुले मिले रहते हैं। गौरतलब है कि विकसित देशों ने नई तकनीकि के जरिए भूजल के विषाक्त होने की समस्या को काफी कुछ हल कर चुके हैं, लेकिन भारत, बांग्लादेश जैसे विकासशील देशों में अभी इस दिशा में ऐसा कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है जिससे लोगों को जहरीला पानी पीने की मजबूरी से छुटकारा मिलता।
पश्चिम बंगाल, राजस्थान और असम की तरह छत्तीसगढ़ ऐसा तीसरा राज्य है जहां पानी में आर्सेनिकक नाइट्रेट जैसे जहरीले रसायनिक तत्व बहुतायत में पाए जाते हैं। कोलकाता, उत्तरी परगना, दक्षिणी परगना एवं मुर्शीदाबाद जैसे अनेक जनपदों में भूजल में आर्सेनिक का होना सामान्य बात है। आंकड़ों के मुताबिक राज्य की 17650 बस्तियों के 1.10 करोड़ लोग जहरीले पानी की उपलब्धता वाले इलाके में रहते हैं। इन इलाकों में रहने वाले ज्यादातर लोग कैंसर, फेफड़े, आंखों की चीमारियां, अस्थमा, त्वचा संबंधी बीमारियों से पीड़ित रहते हैं। चिंता की बात यह है कि राज्य सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं जिससे समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। गौरतलब है कि राज्य सरकार की तरफ से लोगों को साफ और शुद्ध पीने लायक पानी मुहैया कराना बहुत बड़ी चुनौती है।
पीने के पानी की उपलब्धता और बात है, शुद्ध पानी उपलब्ध होना और बात है। इसलिए सरकार को पीने के पाने की उपलब्धता के बजाय शुद्ध पीने के पानी की उपलब्धता को सुनिश्चित करना चाहिए। प्रदूषित पानी पीने से सेहत पर बुरा असर पड़ता ही है जिसे जानवर को पिलाया जाता है और खेती के लिए इस्तेमाल किया जाता है, ये सभी जहरीले तत्यों के असर से दूषित हो जाते हैं। इससे ग्रामीण इलाकों के लोगों, जानवरों और खेती पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक रसायन युक्त पानी के इस्तेमाल से फ्लोराइड से फ्लूरोसिस, नाइट्रेट की अधिकता से श्वास संबंधी बीमारियां, लौह युक्त पानी सेओस्टियोपोरोसिस, आर्थराइटिस और आर्सेनिक युक्त दूषित जल से कैंसर जैसी बीमारियों का सखतरा बढ़ जाता है। यानी यदि भारत के करोड़ों लोगों को साफ और और शुद्ध पानी को मुहैया करा दिया जाए तो करोड़ों लोग तमाम खतरनाक चीमारियों से बच सकते हैं।
जैसे-जैसे तकनीक बेहतर आ रही है वैसे-वैसे समस्याएं कम हो रही हैं। पीने वाले शुद्ध पानी की उपलब्धता भी इस कारण से पहले से अधिक बेहतर हो रही है। नई वैज्ञानिक भूजल शोधन ने तकनीकी से आर्सेनिक, नाइट्रेट और दूसरे जहरीले रसायनों का भूजल में मिश्रित होने की प्रक्रिया को समझकर भूजल के ज़हरीले होने से रोका जा सकता है। उदाहरण के तौर पर अपरदन के माध्यम से चट्टानों में मौजूद खनिज मिट्टी में आर्सेनिक छोड़ते रहते हैं। फिरमिट्टी से यह भूजल में चला जाता है जिससे भूजल जहरीला हो जाता है। इसके अलावा मानव गतिविधियां, जैसे खनन, और भूतापीय ऊष्मा उत्पादन, आर्सेनिक के पेयजल में मिलने की प्रक्रिया को बढ़ाते हैं। इसका एक उदाहरण कोयला जलने के बाद उसकी बची हुई राख जिसमें आर्सेनिक व दूसरे जहरीले पदार्थ होते हैं, हवा या दूसरे माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। गौरतलब है कि भूजल में जहरीले तत्वों के मिश्रण, जिस प्रक्रिया से जल को दूषित करते हैं, उस प्रक्रिया को रोकना असंभव नहीं, तो मुश्किल जरूर है। लेकिन नई तकनीकी के इस्तेमाल से जल का शोधन कर पीने लायक पानी लोगों को मुहैया कराया जा सकता है।
पांच साल पहले केंद्र सरकार ने 2024 तक प्रत्येक परिवार को साफ और शुद्ध पीने का पानी मुहैया कराने की योजना बनाई थी। हर घर नल योजना के तहत इससे बहुत बड़ी आबादी तक पीने का शुद्ध पानी पहुंच चुका है। लेकिन अभी भी बहुत बड़ी आबादी को शुद्ध जल पीने को नहीं मिल रहा है। सवाल यह है कि नदियों, झीलों, नहरों और तालाबों के पानी को साफ और शुद्ध कर क्या सब को साफ और शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जा सकता है? इसलिए भूजल के जहरीले होने और भूजल के स्तर लगातार नीचे चले जाने जैसी विकट समस्या के समाधान के बगैर देश के प्रत्येक परिवार को कैसे साफ और शुद्ध जल उपलब्ध कराया जा सकता है। जल संचयन, बड़े पैमाने पर जल शोधन और जल का अपरिग्रह करके जल से ताल्लुक रखने वाली सभी तरह की समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। केंद्र और राज्य सरकारों की हर परिवार तक शुद्ध जल पहुंचाने की योजना को कारगर ढंग से लागू करने की जरूरत है। फाइलों से जमीन पर योजना लागू होगी तो शुद्ध जल सब को मुहैया कराने में कोई समस्या नहीं आएगी। लेकिन पाताल के नीचे जल की अशुद्धता की कैसे रोका जाएगा, जब तक पाताल का पानी शुद्ध नहीं होगा, तब तक पीने वाले पानी की समस्या का हल होना नामुमकिन लगता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
