आर्थिक चुनौती बनी वैश्विक अस्थिरता      Publish Date : 03/06/2026

आर्थिक चुनौती बनी वैश्विक अस्थिरता

                                                                                               प्रो0 आर. एस. सेंगर

आधुनिक वैश्विक आर्थिक ढांचे के निर्माण में वाशिंगटन कन्सेंसस की अहम भूमिका रही है। वर्ष 1989 में बनी इस सहमति ने नियम आधारित तंत्र के साथ ही नव-उदारवाद और बाजारोन्मुखी आर्थिक नीतियों की राह तैयार करने का काम किया। इसने पूंजी और व्यापार के मुक्त प्रवाह को सुगम बनाया। यह नया आर्थिक ढांचा वृहद स्थिरता (ग्रेट माडरेशन) के रूप में रूपांतरित हुआ।

वर्ष 2007 तक चला यह दौर सभी अर्थव्यवस्थाओं विशेषकर विकसित देशों में स्थायित्व से परिपूर्ण आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करने के साथ ही करोड़ों लोगों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालने में सक्षम रहा। समय के साथ एकध्रुवीय व्यवस्था में नई तरह के ध्रुव भी उभरने लगे। बढ़ते संरक्षणवाद, बहुध्रुवीयता पर आघात, नियम आधारित व्यवस्था से विचलन और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विताओं के साथ वैश्विक आर्थिक ढांचा अनिश्चितता के एक दौर में दाखिल हो चुका है। मनमानापन, संरक्षणवाद और संस्थागत संशय नई वैश्विक व्यवस्था की विशेष पहलू बनते जा रहे हैं। इसमें विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र जैसे स्थापित निकाय उपेक्षा के शिकार हैं।

                   

भारत इस समय व्यापक आर्थिक कायाकल्प एवं ऊंची जीडीपी वृद्धि के दौर से गुजर रहा है। उसने अपनी स्वतंत्रता के सौ. वर्ष पूरे होने से पहले तक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लिया है। इस राह में वैश्विक गतिरोधों से निपटना केवल कूटनीतिक कवायद नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, भू-राजनीतिक घेराबंदी की काट और आर्थिक हैसियत सुनिश्चित करने से जुड़ी जुड़ी रणनीतिक अनिवार्यता है। ऊर्जा सुरक्षा और भू-राजनीतिक घेराबंदी की काट में आर्थिक हैसियत की बड़ी अहम भूमिका होती है और यह स्थिति निरंतर आर्थिक वृद्धि, दृढ़ता एवं लचीलेपन और विशिष्ट उत्पादों के लिए व्यापक वैश्विक बाजारों में पैठ से हासिल होती है। निःसंदेह भारतीय अर्थव्यवस्था जीवंत एवं गतिशीलता से परिपूर्ण है, लेकिन वैश्विक एकीकरण के मामले में चुनौतियां अभी भी कायम हैं।

यदि भारत की क्षमताओं-कमजोरियों की चर्चा करें तो मजबूत घरेलू मांग, बड़ी संख्या में कामकाजी आबादी, वैश्विक प्रौद्योगिकी एवं सेवा क्षेत्र में गहरी पैठ, विविधतापूर्ण आर्थिक आधार तथा रणनीतिक भौगोलिक स्थिति इसकी प्रमुख शक्तिर्या हैं। जबकि निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता, तेल, इलेक्ट्रानिक घटकों और पूंजीगत वस्तुओं के आयात पर भारी निर्भरता उसकी कमजोरियों में हैं। नीतिगत निरंतरता को लेकर संदेह का भाव और वृद्धि के अनुमानों के वित्तपोषणके लिए वित्तीय तंत्र की क्षमताओं को लेकर भी सवाल उठते हैं। चीन से आयात पर निर्भरता के भी जोखिम हैं। उसे कम करने के लिए आपूर्ति श्रृंखला के साझेदारों में विविधता लाना, निर्यात प्रतिस्थापन को प्रोत्साहित करना और लचीले विनिर्माण क्लस्टरों का निर्माण उपयोगी हो सकता है। यह भी न भूला जाए कि तीव्र आर्थिक व्यवधानों से निपटने के लिए एक बहुआयामी रणनीति आवश्यक है, जो आर्थिक लचीलेपन को सुदृढ़, बाहरी साझेदारियों का विस्तार करने और घरेलू संस्थाओं को मजबूत बनाने में मददगार हो।

यह छिपी बात नहीं कि शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और ग्रामीण विकास में ढांचागत असमानताओं को दूर करना आर्थिक वृद्धि में सहायक होगा। इससे घरेलू मांग और सामाजिक स्थिरता की स्थिति भी सुधरेगी। सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है, किंतु अब निजी क्षेत्र के निवेश को भी तेज करना अनिवार्य हो गया है। निवेश से अधिकतम वैल्यू क्रिएशन के लिए सार्वजनिक निजी साझेदारी यानीपीपीपी की संकल्पना को नए सिरे से निर्धारित करना होगा। श्रम सुधारों को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाने के साथ ही अब भू सुधारों का समय भी आ गया है। औद्योगीकिकरण में भूमि अधिग्रहण बड़ा अवरोध बना हुआ है। प्रतिस्पर्धा क्षमता को बढ़ाने के लिए वैश्विक मूल्य श्रृंखला में भागीदारी आवश्यक है, जिसके लिए उत्पादन क्षमता में वृद्धि, गुणवत्ता में सुधार, व्यापार सुगमता को सरल बनाना और निर्यात प्रोत्साहन जैसे कदम जरूरी हैं। वस्त्र, चमड़ा उत्पाद और खाद्य प्रसंस्करण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में मेगा पार्क स्थापित करने के सरकारी प्रस्ताव को शीघ्रता से लागू किया जाना चाहिए, ताकि मात्रात्मक अर्थव्यवस्था, अनुसंधान एवं विकास में निवेश के माध्यम से लागत घटे और गुणवत्ता में सुधार हो सके। भारत को अपने निर्यात उत्पादों के दायरे में भी विविधता लानी होगी। इस दौरान भारत की आर्थिक नीतियों का केंद्र भी प्रमुख वैश्विक आर्थिक शक्तियों के साथ और संतुलन स्थापित करने पर होना चाहिए।

न्यायपालिका और लोक प्रशासन जैसी भारत की प्रमुख संस्थाएं लंबे समय से सुधारों की प्रतीक्षा में हैं। बेहद प्रतिस्पर्धी हो चुके विश्व में अनुबंधों के क्रियान्वयन में असामान्य देरी, ऊंची लागत और प्रशासनिक बाधाएं अब और स्वीकार नहीं की जा सकतीं। इसके अतिरिक्त, लचीले वित्तीय नियामकीय ढांचे और डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़े नियमों को वैश्विक प्रवृत्तियों के अनुरूप भी विकसित होना होगा। हमें बाहरी गतिरोधों के प्रति त्वरित प्रतिक्रिया देने की क्षमताएं भी विकसित करनी होंगी। वर्तमानं अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य यही संकेत करता है कि दुनिया को अभी कुछ समय तक वैश्विक प्रतिद्वंद्विताओं, संरक्षणवाद, संस्थागत अस्थिरता और इन सबसे उपजे संकटों से जूझना पड़ेगा। इसका एक उदाहरण पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात से उपजा ऊर्जा संकट है। इस स्थिति में तेजी से प्रगति के पथ पर बढ़ने के लिए प्रयासरत भारत को भी चुनौतियों से दो-चार होना पड़ेगा। इस राह में दिख रही प्रतिकूलताओं को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए रक्षात्मक सोच से इतर सक्रियता से ओतप्रोत नवोन्मेषी दृष्टिकोण वाले पुनर्निर्माण की आवश्यकता है। यह पुनर्निर्माण जनसांख्यिकी, घरेलू मांग, लोकतंत्र और डाटा से जुड़ी हमारी चार मजबूत क्षमताओं को और सशक्त बनाने का काम करेगा, जिनका उल्लेख अक्सर प्रधानमंत्री भी करते हैं। इसके साथ ही रणनीतिक साझेदारियां बढ़ाने और उन्हें मजबूत बनाने के लिए भी सक्रियता दिखानी होगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।