
अवगुण नहीं है झुकना Publish Date : 02/06/2026
अवगुण नहीं है झुकना
प्रो0 आर. एस. सेंगर
वह एक बचकानी बुद्वि ही है, जो कि चीजों का विश्लेषण करती है और शीघ्र ही नतीजों पर भी पहुंच जाती है। यदि आपकी बुद्वि पूरी तरह से विकसित है, तो आप जितना अधिक चीजों का विश्लेषण करते हैं, उतना ही अधिक आपको लगता है कि कि आप अभी भी किसी निष्कर्ष या नतीजे से बहुत दूर हैं।
वर्तमान समय में वैज्ञानिक पानी को उसके अवयवों में अलग-अलग कर लिया है। ऐसे में उनसे यह पूछेंगे कि पानी क्या है? तो वह उसका उत्तर ऑक्सीजन एवं हाइड्रोजन के रूप में देंगे। लेकिन सवाल यह है कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों मिलकर पानी क्यों बन जाती हैं? और ऐसा क्यों और किस कारण से होता है।?
आप किसी कंकड़ को लेकर देखें और सोचें कि वह ऐसा क्यों है? ऐसे में यदि आपकी रूचि किसी दूसरी चीज में नहीं है तो बस आप केवल अपने आप को ही देखिए और सोचें कि आप ऐसे कैसे बन गए? ऐसा क्यों होता है? और इस सबका आधार क्या है?
वास्तव में तो होता यह है कि जब आप किसी भी पहलू का सत्यता से निष्कर्ष करते हैं तो आप निष्कर्ष से भी उतना ही अधिक दूर होते चले जाते हैं। आपको जीवन पहले से भी अधिक रहस्यमय लगने लगता है। किसी गहरे विश्लेषण के साथ जानने की कोशिश करने के स्थान पर यदि आप बस केवल वहां बैठते हैं और सांस लेते हैं तो आप अपने जीवन के बारे में अधिक बेहतर तरीके से जान सकते हैं। आप जीवन में जितनी अधिक गहराई में जाएंगे, उसकी गहराई को भी आप उतना ही अथाह पाएंगे।

आप जीवन को कभी भी पूरी तरह से नहीं समझ सकते क्योंकि आप स्वयं ही एक जीवन हैं। आपको अपने अनुभव में जब यह अहसास होता है कि प्रत्येक परमाणु, रेत का प्रत्येक कण, प्रत्येक कंकड़ और प्रत्येक जीवन अथाह होता है, तो आप स्वाभाविक रूप से प्रत्येक वस्तु के आगे परम-भक्ति से नत-मस्तक हो जाएंगे।
भारत में तो प्राचीन काल से ही यह परंपरा रही है कि आप जिस किसी भी चीज को देखते हैं, उसके आगे अपना सिर झुकाते हैं, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह एक पेड़ है, एक गाय है, एक सांप है, बारिश है या फिर बादल है, आप तो केवल अपना सिर झुकाते हैं। आप ऐसा करते हैं, क्योंकि या तो आप एक मूर्ख हैं या फिर आप ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि आपने जीवन को पूरी गम्भीरता के साथ उसकी चरम गहराईयों तक देखा है।
एक मूर्ख और आत्मज्ञानी इंसान के बीच बहुत मामूली सा ही अन्तर होता है। यह उस चीज के बारे में है, फिर भी जमीन और आसमान का अन्तर होता है। एक मूर्ख व्यक्ति जो भी थोड़ा बहुत वह जानता है, वह बस उसी का आनंद प्राप्त कर लेता है और दूसरा वह व्यक्ति जिसने जीवन को उसकी चरम गहराईयों तक देखा है वह उसका सम्पूर्ण आनंद प्राप्त करता है।
जब आप किसी चीज को अपने आप से बहुत विशाल अनुभव करेंगे, तो यह स्वाभाविक ही है कि आप उसके आगे झुक जाएंगे। इस प्रकार से यदि आप एक भक्त बनना चाहते हैं तो अपने जीवन के जागते हुए प्रति क्षण झुकें। सबसे पहले अपने मन में झुकें। एक बार जब यह आपके जीवन जीने का तरीका बन जाता है तो आप एक उत्तम कोटि के भक्त बन जाते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
