
खुद के लिए भी जीना सीखें Publish Date : 29/05/2026
खुद के लिए भी जीना सीखें
प्रो0 आर. एस. सेंगर
हम प्रकृति की शिकायत क्यों करते हैं? उसने तो हमें जीवन का उदार और पर्याप्त विस्तार दिया है। वास्तव में जीवन लंबा है, यदि हम उसे समझदारी और सजगता से जीना सीख लें। लेकिन मनुष्य स्वयं ही अपनी मूर्खताओं और दुर्बलताओं के कारण जीवन को छोटा बना लेता है। कोई असीम लालच में उलझा रहता है, तो कोई उन कार्यों में अपना समय नष्ट करता है, जिनका कोई महत्त्व नहीं होता। कोई मदिरा और भोग-विलास में डूबकर अपनी चेतना खो देता है, तो कोई आलस्य के कारण अपनी संभावनाओं को समाप्त कर देता है।
कुछ लोग महत्वाकांक्षा के ऐसे जाल में फंस जाते हैं, जो दूसरों की स्वीकृति और निर्णयों पर निर्भर करता है। वे स्वयं के लिए नहीं, बल्कि दूसरों की दृष्टि में महान बनने के लिए जीते हैं। कुछ लोग व्यापार तथा लाभ की लालसा में दूर-दूर तक भटकते हैं, समुद्रों और देशों की यात्राएं करते हैं, लेकिन उनके भीतर शांति का अभाव बना रहता है। कुछ लोग युद्ध के जुनून से पीड़ित हैं और हमेशा या तो दूसरों को खतरे में डालने की फिराक में रहते हैं, या फिर अपने ही खतरे की चिंता में डूबे रहते हैं।

कुछ ऐसे भी हैं, जो बड़े और शक्तिशाली लोगों की सेवा में अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं, जहां उन्हें न तो सम्मान मिलता है और न ही संतोष। कई लोग दूसरों की सफलता के पीछे भागते हैं, जबकि कुछ अपनी असफलताओं का विलाप करते रहते हैं। ऐसे लोग अपने जीवन का कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं बनाते। वे चंचल, अस्थिर और असंतुष्ट रहते हैं, और हर समय नई-नई योजनाओं में उलझे रहते हैं। इस प्रकार वे अपने जीवन को वास्तव में जीते नहीं, बल्कि केवल समय बिताते हैं।
जैसा कि एक महान कवि ने कहा है, 'जीवन का वही अंश सच्चा है, जिसे हम जागरूकता और अर्थ के साथ जीते हैं; शेष सब केवल समय का प्रवाह है।' हमारे दोष, वासनाएं और इच्छाएं हमें चारों ओर से जकड़ लेती हैं। वे हमें ऊपर उठने और सत्य को देखने नहीं देतीं, बल्कि हमें अपने बंधनों में बांधकर रखती हैं। यह केवल उन लोगों की बात नहीं है, जो दुखी हैं। उन लोगों को भी देखिए, जिनकी सफलता और समृद्धि की लोग प्रशंसा करते हैं। वे भी अपने ही वैभव के बोझ तले दबे रहते हैं। धन, प्रसिद्धि और निरंतर प्रदर्शन की चाह उन्हें थका देती है। कुछ लोग निरंतर सुखों के पीछे भागते-भागते भीतर से रिक्त हो जाते हैं।
हर व्यक्ति किसी न किसी के लिए जी रहा है, पर स्वयं के लिए नहीं। कोई भी अपने जीवन का स्वामी नहीं रह गया है। लोग दूसरों से समय और ध्यान की अपेक्षा करते हैं, पर स्वयं को समय देना भूल जाते हैं। सच्चाई यह है कि हम दूसरों से नहीं, बल्कि स्वयं से दूर हो चुके हैं। यदि हम अपने भीतर झांकना सीख लें, स्वयं को सुनना और समझना शुरू कर दें, तो जीवन का वास्तविक अर्थ हमारे सामने अपने आप प्रकट हो जाएगा।
जीवन को व्यर्थ न गंवाएं
प्रकृति ने जीवन को सुंदर और अर्थपूर्ण बनाया है, पर मनुष्य अपनी इच्छाओं, लालच और अस्थिरता में उसे व्यर्थ कर देता है। जो स्वयं को समझना सीख लेता है, वही जीवन को सच में जीता है, क्योंकि सच्चा जीवन वही है, जिसमें हम अपने भीतर झांककर शांति, उद्देश्य और आत्मबोध को प्राप्त करते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
