मैं से बाहर निकलें कुदरत की सुंदरता दिखेगी      Publish Date : 28/05/2026

मैं से बाहर निकलें कुदरत की सुंदरता दिखेगी

                                                                                                                  प्रो0 आर. एस. सेंगर

मनुष्य का जीवन केवल जीने मात्र की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक गहरा अनुभव और एहसास है। यदि इसे सही ढंग से जिया जाए, तो यह हमें सच्ची संतुष्टि और आनंद दे सकता है। फिर भी अक्सर लोग अपने जीवन में दुख, चिंता, डर, असंतोष, ईर्ष्या और नफरत जैसे भावों से घिरे रहते हैं। किसी को पैसा नहीं होने का दुख है, तो किसी को अच्छी नौकरी नहीं होने का असंतोष।

किसी को सम्मान की भूख है, तो कोई जिंदगी की दौड़ में पिछड़ जाने की चिंता में खाक हुआ जा रहा है। कोई दूसरों के सुख को देख कर मन ही मन ईर्ष्या में जला जा रहा है। इसका असल कारण यह नहीं है कि लोगों के पास पैसे या दूसरी चीजों की कोई कमी है, बल्कि सच्चाई यह है कि वे जीवन को देखने और जीने का सही तरीका ही नहीं अपनाते। अच्छा जीवन वह है, जिसमें व्यक्ति अपने छोटे 'मैं' से बाहर निकलकर दुनिया, लोगों और अपने काम में वास्तविक रुचि लेता है। ज्यादातर लोग खुश क्यों नहीं रह पाते, क्यों उनके भीतर एक कुलबुलाहट मची रहती है, क्यों वे जिंदगी में सार्थकता नहीं खोज पाते, क्यों निरर्थकता उन पर हावी रहती है, आदि ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब खुद व्यक्ति के भीतर ही छिपा है। जब व्यक्ति केवल अपने ही सुख-दुख, इच्छाओं और समस्याओं में उलझा रहता है, तो उसका दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है। यही आत्म-केंद्रिकता धीरे-धीरे तनाव, असंतोष और तुलना की भावना को जन्म देती है।

                                   

अब जरा इसके उलट विचार करके देखें। जब व्यक्ति अपने 'मैं' से बाहर निकलता है और दुनिया की ओर देखता है, तो उसके अनुभवों का दायरा बढ़ता चला जाता है। वह कुदरत की खूबसूरती में आनंद लेने लगता है। अपने काम में सार्थकता खोजने लगता है। यह बदलाव होता तो बहुत सूक्ष्म है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत गहरा होता है। यह वह स्थिति होती है, जब जीवन केवल 'मेरे लिए क्या है' का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि 'मैं जीवन में क्या जोड़ सकता हूं' का प्रश्न बन जाता है।

जीवन में रुचियों का विस्तार भी उतना ही जरूरी है। यदि व्यक्ति केवल एक ही चीज में उलझा रहता है, तो असफलता की स्थिति में वह टूट सकता है। लेकिन यदि उसकी रुचियां व्यापक हैं, जैसे कला, साहित्य, प्रकृति, समाज या विज्ञान तो वह हर परिस्थिति में कुछ न कुछ ऐसा पा सकता है, जो उसे खुशी देता हो। जब हम केवल अपने बारे में सोचते हैं, तो हमें अपनी समस्याएं बहुत बड़ी लगती हैं। लेकिन जब हम दूसरों के जीवन को समझते हैं तो हमें यह एहसास होता है कि जीवन में संघर्ष एक सामान्य बात है। इससे हमारे भीतर धैर्य और स्वीकार्यता विकसित होती है।

                                 

अच्छा जीवन किसी बाहरी उपलब्धि का नाम नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक स्थिति है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपने जीवन को कैसे देखते हैं और उसे कैसे जीते हैं। यदि हम अपने छोटे-से अहंकार से ऊपर उठ कर जीवन के व्यापक आयामों में रुचि लेना सीख जाएं, तो खुशी अपने आप हमारे जीवन का हिस्सा बन जाती है।

दूसरों के सुख-दुख में भागी बनें

जब मनुष्य अपने संकुचित स्वार्थ और अहंकार की सीमाओं से बाहर निकलकर जीवन को व्यापक दृष्टि से देखना शुरू करता है, दूसरों के सुख-दुख में सहभागी बनता है, तब उसके भीतर संतोष, शांति और आनंद का स्वाभाविक संचार होने लगता है, और यही अवस्था उसे एक सार्थक, संतुलित और सचमुच खुशहाल जीवन की ओर ले जाती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।