दाल आत्मनिर्भरता को गति देंगी जायद फसलें      Publish Date : 28/05/2026

दाल आत्मनिर्भरता को गति देंगी जायद फसलें

                                                                                    प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

‘‘दाल की घरेलू आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दशकों से दालों आयात करती आ रही केंद्र सरकार और अब सरकार अगले पांच वर्षों के भीतर दलहन में आत्मनिर्भरता के लिए प्रयासरत है। रबी एवं खरीफ दाल से अलग जायद (ग्रीष्मकालीन) दलहन की फसलों ने के रकबे में भी तेजी से हो रही वृद्धि उम्मीद जता रही है। रकबे में यह वृद्धि उस स्थिति में है जब कि कई राज्यों में जलाशयों का स्तर बहुत कम है। दूसरी 5 ओर, बफर स्टाक को भी समृद्ध करने के लिए सभी प्रयास जारी है।

देश में ग्रीष्मकालीन फसलों का रकबा लगभग 72 लाख हेक्टेयर है। मार्च मध्य तक 40 लाख हेक्टेयर में बोआई हो चुकी थी। जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में लगभग 33 लाख हेक्टेयर में दलहन की बोआई ही की गई थी। इस बार मध्य मार्च में ही दलहन का रकबा दोगुना से भी अधिक हो गया है, जबकि ग्रीष्मकालीन फसलों की बोआई मई तक चलती है। पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान दलहन का रकबा 2.05 लाख हेक्टेयर था। इस बार मूंग एवं उड़द की बोआई में तेज वृद्धि देखी जा रही है। मूंग की बोआई 1.34 लाख हेक्टेयर से 168 प्रतिशत बढ़कर 3.58 लाख हेक्टेयर हो गई है, जबकि उड़द की बोआई 63 हजार हेक्टेयर से 106 प्रतिशत बढ़कर 1.3 लाख हेक्टेयर हो गई है।

बफर स्टाक को भी समृद्ध करेंगी सरकार

                                   

आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए सरकार पैदावार बढ़ाने के साथ ही बफर स्टाक को भी समृद्ध कर रही है। दलहन की खेती के लिए किसानों को प्रेरित और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार अगले चार वर्षों तक तुअर (अरहर), मसूर एवं उड़द की सारी उपज की खरीदारी करेगी। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बफर स्टाक के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर तुअर 13.22 लाख टन, मसूर 9.40 लाख टन एवं उड़द 1.35 लाख टन खरीदारी को मंजूरी दी है।

दलहन के उत्पाद जैसे पत्ते, पॉड कोट और चोकर पशुओं को सूखे चारे के रूप में दिए जाते हैं। कुछ दलहनी फसलें जैसे चना, लोबिया, उरदबीन और मूंग को हरे चारे के रूप में पशुओं को खिलाया जाता है। मूंग के पौधों का उपयोग हरी खाद के रूप में भी किया जाता है जो मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करता है और मिट्टी में पोषक तत्व जोड़ता है। भारत और दुनिया में कई दलहनी फसलें उगाई जाती हैं। हमारे देश की दलहनी फसलों में प्रमुख हैं चना, अरहर, मसूर, मटर आदि। अखिल भारतीय मेडिकल काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक खुराक्क्र में विभिन्न रंगो के खाद्य पदार्थों का बड़ा महत्व है। 5 वर्ष तक के आयु के बच्चों को तीन रंग का खाना (तिरंगा खाना) और व्यस्कों को सात रंग (सतरंगी खाना) जो हमें इन्द्रधनुष की याद दिलाता है, दालों का इसमें अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान है।

कोई आश्चर्य नहीं कि भारत दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश है। दालों की आपूर्ति अधिकतर योजनावधि में, मांग की तुलना में कम रही है, जिससे देश को बड़ी मात्रा में दालों का आयात करना पड़ा है। मगर अब दलहन उत्पादन को लेकर पिछले कुछ वर्षों में स्थितियां बदली हैं। दलहन उत्पादन में तेजी से बढ़ता रकबा भारत को आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रहा है। अब भारत दुनिया में दालों के वैश्विक उत्पादन में लगभग 24 प्रतिशत का योगदान करने लगा है जो दलहनों का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता देश बना चुका है।

                                    

देश में दालों का उत्पादन पिछले पांच-छह वर्षों में 1.4 करोड़ टन (140 लाख टन) से बढ़कर 2.4 करोड़ टन (240 लाख टन) हो गया है। हालांकि वर्ष 2019-20 में, भारत ने दो करोड़ 31.5 लाख टन दालों का उत्पादन किया, जो कि वैश्विक उत्पादन का 23.62 प्रतिशत हिस्सा है। ऐसा करके भारत दालों के उत्पादन में लगभग आत्मनिर्भर हो गया है। निसंदेह यह देश के किसानों के लिए सुखद बात है, मगर आज भी दलहन उत्पादन के मामले में कई चुनौतियां खड़ी हैं जिनका सरकार के स्तर पर समाधान जरूरी है।

अगर वर्ष 1950-51 से 2018-19 तक कृषि उत्पादन की प्रवृत्ति अनाज और दाल का तुलनात्मक अध्ययन करें तो जहाँ इस दौरान अनाज में गेहूं का इंडेक्स 64 से बढ़कर 991 तक पहुंच गया है। वहीं दालों का इंडेक्स 84 से बढ़कर महज 240 स्तर तक ही पहुंच सका है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।