उत्पाती होते बच्चों की मानसिकता      Publish Date : 21/05/2026

       उत्पाती होते बच्चों की मानसिकता

                                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

‘‘अपने बच्चे को बचपन से ही आक्रमकता के बुरे परिणामों के बारे में सचेत कराना चाहिए। ऐसे में ‘टिट फॉर टेट’ अर्थात जैसे को तैसा का पाठ न पढ़ाते हुए उसे इस प्रकार की स्थिति को सही तरीके हैंडल करना सिखाएं। उन्हे अपने टीचर, प्रिसिपल और पेरेन्ट्स से शिकायत करने की सलाह दें, बजाय इसके कि स्वयं मारपीट करके हिसाब बराबर करने के, क्योंकि ऐसे हिसा कभी भी मारपीट करने से बराबर नहीं होते हैं। इसके लिए अपने बच्चे पर शुरूआत से ही ‘वॉच’रखें। यदि आपको अपना बच्चा नॉर्मल व्यवहार से हटकर व्यवहार करता हुआ दिखे तो आपको अविलम्ब सावधान हो जाना चाहिए। किसी भी बच्चे का आक्रमक होना अपने आप में एक चिंता का विषय होता है।’’

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि बच्चों का अधिकांश समय शिक्षा ग्रहण करते हुए उसकी क्लास में ही व्यतीत होता है, जहाँ उसका अपने क्लासमेट्स के साथ इंटर एक्शन एक लम्बे समय तक चलता है। प्रत्येक बच्चा अपने जींस और संस्कारों के अनुरूप ही ढलता है परन्तु वातावरण का प्रभाव उनकी मानसिकता पर जितना इमीडिएट पड़ता है, उसे भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस बात से तो हम सभी अच्छी तरह से परिचित हैं ही कि टीवी और सिनेमा का प्रभाव आज समय में बच्चों पर कितना गलत पड़ रहा है। ऐसे में ग्लैमर की चकाचौंध, ऐशपूर्ण जीवनशैली, स्वच्छंदता, उदंड़ता, बड़ों की सीख की अवहेलना और अपनी मनमर्जी को ही चलाना वर्तमान का नार्म कहा जा सकता है। वर्तमान के बच्चों में धैर्य अथवा इसे इस प्रकार से कहा जाए कि आज के कल्चर में ही धैर्य का गुण नहीं है, तो यह कतई भी गलत नहीं होगा। आज जबकि बड़ों में ही इस गुण का सर्वथा अभाव है तो फिर बच्चों में इस गुण के होने की आशा भी कैसे की जा सकती है। आज रोड रेज के किस्से भी काफी हद तक बढ़ चुके हैं और ऐसा ही कुछ हाल क्लास रेज का भी है।

                                   

क्लास में बुली करना और दादागिरी दिखाने के किस्से तो टॉम जोंस, चार्ल्स डिंकन के जमाने से ही चले आ रहे हैं लेकिन आज तो इनका स्वरूप अपनी सारी हदें पार कर चुका है। गर्लफ्रेंड को लेकर या पैसों को लेकर आज के लड़के अपने साथ पढ़नें वाले दोस्तों तक की जान ले रहे हैं और कभी कोई मामूली सी कहासुनी भी किसी बड़े झगड़े को जन्म दे देती है। इस समय लड़कों में परिपक्वता की कमी होती है और उनका खून भी गर्म होता है जिसके चलते वह जोश में अपना होश खो बैठते हैं और ऐसा कुछ भी कर गुजरते हैं कि इससे कई जिन्दगियाँ एक साथ ही बर्बाद हो जाती हैं और उनका अपना भविष्य तो अन्धकार में डूब ही जाता है।

माँ-बाप पर यदि उंगली उठती है तो यह भी सही नहीं है, तो कई बार स्थिति माँ-बाप के नियंत्रण में नहीं रहती है। लाख कोशिशों, सेक्रिफाइगेज के बावजूद भी बच्चा उनके कहने में नहीं रहजा और उनकी बात नहीं सुनता है और उसका जीवन खराब हो जाता है। ऐसे में वह स्वयं को दोषी मानकर सिर धुनते और पछताते रह जाते हैं। पेपर प्रेशर, आज का माहौल, बदलती सोच, फैशन के प्रति दीवानगी और बढ़ती महत्वकांक्षाओं से अपने बच्चों को किस प्रकार से बचाकर रखा जाए?

सबसे अधिक आवश्यक है बच्चों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखना, उनमें अपने प्रति विश्वास को बनाए रखना, जिससे क वह अपनी समस्त बातों को आपके साथ बिना किसी झिझक के शेयर करते रहें। बच्चों को यह समझाना भी उतना ही आवश्यक है कि उनमें यह विश्वास जगाया जाए कि आप उन्हें अच्छी तरह से समझते हैं। उनकी गलतियों पर कोई तूफान खड़ा करने के स्थान पर उन्हें डांटने, मारने या जलील करने के, उन्हें माफ करते हुए यह सोचना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? बच्चों को यह भी समझाया जाना चाहिए कि ऐसा करने से उन्हें कितना नुकसान हुआ, हो सकता है या फिर होने वाला है।

ऐसे में बचपन से ही बच्चों को आक्रमकता के बुरे परिणामों के प्रति सचेत करना भी उतना ही आवश्यक है। ऐसे में बच्चों को ‘टिट फॉर टेट’ अर्थात जैसे को तैसा का पाठ न पढ़ाते हुए उसे इस प्रकार की स्थिति को सही तरीके हैंडल करना सिखाएं। उन्हे अपने टीचर, प्रिसिपल और पेरेन्ट्स से शिकायत करने की सलाह दें, बजाय इसके कि स्वयं मारपीट करके हिसाब बराबर करने के, क्योंकि ऐसे हिसा कभी भी मारपीट करने से बराबर नहीं होते हैं।इसके लिए अपने बच्चे पर शुरूआत से ही ‘वॉच’ रखें। यदि आपको अपना बच्चा नॉर्मल व्यवहार से हटकर व्यवहार करता हुआ दिखे तो आपको अविलम्ब सावधान हो जाना चाहिए। किसी भी बच्चे का आक्रमक होना अपने आप में एक चिंता का विषय होता है।

स्मझाने के बाद भी बच्चा यदि नहीं समझता है तो उसके स्कूल में क्लास टीचर, काउंसलर से मिलकर यह जानने का प्रयास करें कि क्लास या स्कूल में कोई आपके बच्चे की बुली तो नहीं कर रहा है। बच्चा जो कुछ भी पढ़ता है, जो कुछ टीवी आदि पर देखता है और वीडियो गेम आदि जो कुछ भी खेलता है उस पर भी नजर बनाएं रखें। हिंसा और सैक्स कंटेंट आदि से भरपूर फिल्में बच्चों को न देखने दें। यदि आपके पास रिवॉल्वर आदि कोई ऐसी ही सामग्री है तो उसे भी अपने बच्चे की पहुंच से दूर ही रखें और अपने बच्चे का स्कूल बैग भी समय-समय पर चैक करते रहना चाहिए। यदि उसके स्कूल बैग में कोई भी ऐसी चीज, जिसे वह हथियार के रूप में प्रयोग कर सके, बरामद होती है तो आपको तुरंत ही सावधान हो जाना चाहिए। यदि इस पर उचित एक्शन समय रहते ही लेंगे तो आने वाली मुसीबतों को टाला जा सकता है।

ठसके साथ ही पेरेन्ट्स टीचर मीट में भी आपको आवश्यक रूप से जाना ही चाहिए। वहां आपको अपने बच्चे के बारे में जो भी फीडबैक मिलता है, बच्चे के बारे में जो भी शिकायतें मिलती है, उनके ऊपर भड़कने के स्थान पर उनके ऊपर ठंड़ें दिमाग से विचार करना चाहिए। बच्चों के लिए रेंज की अभिव्यक्ति भी जरूरी है। इसके साथ बच्चों को उनके क्रोध को पहचानना और उसे स्वीकार करना भी सिखाएं।

बच्चों के लिए आप स्वयं भी उनका रोल मॉडल बनने का प्रयास करें। विपरीत परिस्थितियों में आप स्वयं कैसे रिएक्ट करते हैं और आपका अपने ऊपर कितना नियंत्रण रहता है, उस व्यवहार का भी बच्चे पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है, जो कि उसके लिए उसकी बाद की जिन्दगी में उसके व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा बन जाता है। यदि आप विपरीत परिस्थितियों में भी कूल बने रहते हैं तो आपका बच्चा भी हॉट होकर क्लास में उत्पात मचाएगा, इसके चांसेज बहुत कम हो जाते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।