
सच्चाई की लौ कभी नहीं बुझती Publish Date : 06/05/2026
सच्चाई की लौ कभी नहीं बुझती
प्रो0 आर. एस. सेंगर
सुकरात वह व्यक्ति थे, जिन्होंने दर्शन को स्वर्गीय कल्पनाओं से मुक्त कर धरती पर उतारा और उसे मनुष्य के जीवन, उसके नैतिक संचयों और आत्मा की सच्चाई के बीच स्थापित किया। उनसे पहले यूनानी विचार जगत खरमांडलीय उलझनों में भटका करता था- जैसे संसार किससे बना है, वह ऊपर क्यों टिका है, देवताओं की संरचना कैसी है। लेकिन युद्ध और अराजकताओं के बीच भी सुकरात ने मानव जीवन के सार पर प्रश्न उठाए कि वह श्रेष्ठ जीवन क्या है, जिसे जीने योग्य कहा जा सके?
जब अन्यायी व्यक्ति अधिक लाभ पाता है, तब भी मनुष्य को नैतिक क्यों बने रहना चाहिए? सुख क्या केवल इच्छाओं को तृप्ति है, या फिर वहे पुण्य है, जो आत्मा को निर्मल करता है? हालांकि, सुकरात उत्तर नहीं देते, ऋल्कि वह प्रश्नों के माध्यम से आत्मा को उत्तर की ओर ले जाते हैं। यही है उनकी सुकरात पद्धति, यागी संवाद की वह ज्योति, जो अज्ञानता के अंधकार को उजागर करती है। वह स्वयं स्वीकारते हैं कि में यह जानता है कि मैं कुछ नहीं जानता और इसी स्वीकार में उनके भीतर वह बुद्धिमत्ता जन्म लेती है, जो मनुष्यों में विरल है।
वह एक ऐसे इन्सान थे, जो अहंकार से रहित, पूर्वग्रहों से मुक्त, जो प्रत्येक सत्य के स्रोत से ज्ञान का रस ग्रहण करने की तत्पर रहते थे। पर जब उन्होंने समाज को समीप से देखा, तो पाया कि अधिकतर मनुष्य अपने ही दंभ और मिथ्या ज्ञान से इतने भरे हैं कि सत्य के लिए स्थान ही नहीं बचा। सुकरात उन सभी भ्रमों को तोड़ते हैं, जिन पर मनुष्य अपना अस्तित्व टिका मानता है- प्रतिष्ठा, मान्यताओं और असत्य विचारों का महल और जब उन्होंने जनता के सामने यही सत्य रखा, तो वही समाज, जो अंधकार में रहने का अभ्यस्त था, उसकी रोशनी से शुशला उठा।

परिणामस्वरूप, सत्य की अपनी निष्ठा की कीमत सुकरात ने मृत्यु के रूप में चुकाई। उन्हें युवाओं को भ्रमित करने का अपराधी कहा गया, और विषपान का आदेश दिया गया। किंतु जिस शांति और गरिमा से उन्होंने अपने अंत को स्वीकार किया, वही उनकी शिक्षाओं का अंतिम प्रमाण थी।
जहां सामान्य मनुष्य मृत्यु से भयभीत होता है, वह मुस्कराते हुए अपने मित्रों के. बीच दर्शन पर चर्चा कर रहे थे। सुकरात के लिए मृत्यु अंत नहीं थी, वल्कि आत्मा की आजादी का वह पल था, जब चेतना शरीर की सीमाओं से निकलकर उस सच्चाई की ओर बढ़ती है, जहां वह अनंत में मुक्त हो जाती है। सुकरात सिखाते हैं कि जब तक मनुष्य में प्रश्न पूछने का साहस, सत्य को खोजने की ईमानदारी, और अपनी अज्ञानता को स्वीकार करने की विनम्रता बनी रहती है, तब तक उसका मन भटकेगा नहीं और आत्मा के भीतर एक ऐसी प्रसन्नता उत्पन्न होगी, जो समय, मृत्यु और भ्रम से परे है।
अंतःकरण की आवाज पहचानें

सच्चा ज्ञान अज्ञानता को स्वीकार करने से शुरू होता है। जीवने का उद्देश्ण सुख नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और सत्य की खोज है। प्रश्न पूछना ही चेतना को जाग्रत रखता है, और नैतिकता ही मनुष्य को ऊंचा बनाती है। इन्सान को प्रतिष्ठा या मिथ्या ज्ञान के पीछे नहीं, बल्कि अपने अंतःकरण की आवाज के पीछे चलना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
