
सर्वव्यापी ईश्वरीय सत्ता Publish Date : 05/05/2026
सर्वव्यापी ईश्वरीय सत्ता
प्रो0 आर. एस. सेंगर
जब किसी भीषण दुर्घटना के बाद भी कोई व्यक्ति सही सलामत बच निकलता है तो हम मान लेते हैं, अवश्य कोई अदृश्य शक्ति है, जिसका निर्णय अंतिम होता है। अदम्य इच्छा, पर्याप्त संसाधन, अच्छी योजना और अथक प्रयास के बाद भी कुछ कार्य होते-होते फलीभूत नहीं होते। इसके विपरीत सहज बुद्धि और तर्क से जो कार्य असंभव था वह कदाचित संपन्न हो जाता है। मनुष्य की कितनी भी इच्छाएं हों, समस्त लौकिक गतिविधियों के संचालन की ईश्वर की अपनी वृहत्तर व्यवस्था है जिसमें मानवीय हस्तक्षेप निष्फल रहता है।

सृष्टि में समस्त प्राणियों, वनस्पतियों तथा जल-थल सतहों से इतर अनेक अदृश्य, अबूझ अस्मिताएं विद्यमान रहती हैं। मानव जाति इस अनंत, विराट व्यवस्था की एक छोटी सी इकाई है। ईश्वर सृष्टि के प्रत्येक अंग के जीवन चक्र के संचालन और समस्त घट्कों में परस्पर समन्वय का दायित्व निभाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बहुआयामी प्रसार, उपयोग और इसमें शोध के बाद भी अभी तक मनुष्य को अनेक क्षेत्रों की जानकारी आधी अधूरी है, और इसे समय-समय पर संशोधित किया जाता रहा है। अपने अज्ञान को समझ लेंगे तो अपने ज्ञान पर अहंकार नहीं होगा।
निहित स्वार्थों और लोभ से अभिप्रेरित मनुष्य की आकांक्षाएं भले ही महासांगर जैसी अनंत हों, किंतु उसकी वास्तविक भूमिका एक बूंद से अधिक नहीं है। इस सत्य को जानने वाला ईश्वरीय शक्ति के समक्ष नतमस्तक रहेगा। ईश्वर सर्वव्यापी हैं। हम भले ही भ्रम में जीते रहें कि हमारा अनुचित कार्य कोई नहीं देख रहा, किंतु वे जानते हैं किस आशय से हम कब, क्या-क्या करते हैं और उसी अनुसार न्याय देते हैं। यह समझ लेंगे कि कण-कण में व्याप्त ईश्वरीय अंश सभी में निहित है और हम उसी की संतति हैं तो हम सद्गुणों को अपनाते हुए उसी सन्मार्ग पर प्रशस्त रहेंगे जैसा ईश्वर चाहते हैं। तब अवगुण छूट जाएंगे और धन्य हो जाएंगे।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
