सरकारी स्कूलों में हो तैयारी की व्यवस्था      Publish Date : 02/05/2026

  सरकारी स्कूलों में हो तैयारी की व्यवस्था

                                                                                                   प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

हमारे आज के समाज को स्कूल-कालेज की इतनी जरूरत नहीं है, समाज को सामाजिक शिक्षा की जरूरत है। उन्हें जहां वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं को पूरी करने के लिए शिक्षा मिलेगी, वह वहां जाएंगे। उसका नाम गुरुकुल, स्कूल, कालेज, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, कोचिंग, ट्यूशन, सरकारी, निजी आदि जो भी चाहे दे सकते हैं। जेईई मेन व एडवांस, नीट जैसी प्रवेश परीक्षाएं और स्कूल व कालेजों में होने वाली पढ़ाई में तारतम्य रहेगा तो परिणाम भी अनुकूल ही आएंगे। वर्तमान में परिणाम प्रतिकूल आ रहे हैं। तारतम्य में रिक्ति बढ़ी है, जिसका परिणाम है कि समाज का विश्वास उन संस्थानों से कम हुआ है, जहां पहले हुआ करता था। अब जो पढ़ा सकेगा, उसके लिए लोग वहीं लोग दौड़ेंगे। इसकी कसौटी कोई राकेट साइंस नहीं है। यह पूरा मामला आवश्यकता और पूर्ति पर ही निर्भर करता है।

पांच-छह दशक के सार्वजनिक जीवन में हमें एक भी उदाहरण नहीं मिला कि आइआइटी, एनआइटी, आइआइएम जैसे संस्थानों में पढ़ाई करने वाले छात्रों ने अपने सेमेस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए कोचिंग या ट्यूशन का सहारा लिया हो। जब तक हमारे यहां स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता कायम रहेगी, तब तक कोचिंग, ट्यूशन या अन्य व्यवस्था की संभावना लोगों को नहीं दिखेगी। गुणवत्ता में गिरावट आते ही समाज का रुख दूसरे विकल्प की ओर जाना स्वभाविक है। गुणवत्ता में गिरावट क्यों आई, इसका जवाब हर किसी के पास मौजूद है। सरकार पैसे खर्च कर रही है, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहा है।

                                           

इसका इलाज भी समाज और सरकार दोनों को ही मिलकर करना होगा। अभी बिल्डिंग और ढांचागत सुविधा पर ध्यान ज्यादा दिया जा रहा है जबकि इसका नंबर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के बाद आता है। स्कूल-कालेज लोग अच्छी शिक्षा के लिए जाते हैं, सुविधा तो सेकेंडरी है। हम सेकेंडरी को ही प्राइमरी समझ रहे हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित होती है अच्छे शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच संवाद व व्यवहार से। शिक्षा का मतलब सिर्फ परीक्षा उत्तीर्ण करना नहीं है। यह समाज का तानाबाना भी बुनती है, समाज की दिशा और राष्ट्र-राज्य का भविष्य भी निर्धारित करती है।

                         

यह विद्यार्थियों का चातुर्दिक विकास भी सुनिश्चित करती है। कोचिंग इंस्टीट्यूट या इससे मिलते-जुलते संस्थानों का लक्ष्य परीक्षा उत्तीर्ण होने के आसपास ही होता है। इसका प्रतिकूल प्रभाव भी दिखने लगा है। इस कारण ही इनकी व्यवस्था पर प्रश्न खड़े किए जा रहे हैं। वर्तमान व्यवस्था ने आमजन के लिए विकल्प को सीमित कर रखा है। वर्तमान व्यवस्था संपन्न और साधारण परिवार के विद्यार्थियों के बीच पढ़ाई की गुणवत्ता की खाई को पाटने के बजाए बढ़ाने की ओर दिख रही है। यह चिंतन का एक गहन विषय है।

सरकारी विद्यालय तो होने ही चाहिए, जो मेरे विचार में सभी जिलों में ऐसे कुछ जेईई-नीट जैसी प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए चिह्नित होने चाहिए। यहां जिले के चयनित बच्चों को आवासीय सुविधाएं दी जाएं। स्कूल के परिणाम की निगरानी व त्रुटियों में सुधार के लिए निरंतर प्रयास के विकल्प भी खुले हुए होने चाहिए। इसका सबसे ज्यादा लाभ समाज के जरूरतमंद बच्चों को मिलेगा। शिक्षकों की चुनाव प्रक्रिया में दिन प्रति दिन भागीदारी बढ़ती जा रही है। राजनीतिक दलों व व्यक्तियों से उनका संपर्क बढ़ने का प्रतिकूल प्रभाव शिक्षा पर दिखता है। चुनाव प्रक्रिया और बूथ पर भूमिका बढ़ने से राजनीतिक दल चिंतित रहते हैं कि शिक्षक का संबंध उनसे बिगड़ नहीं जाए। शिक्षक को सिर्फ शिक्षा तक ही जोड़कर रखने की आवश्यकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।