
परंपरागत खेती का नवीन तकनीकों के साथ Publish Date : 28/04/2026
परंपरागत खेती का नवीन तकनीकों के साथ
प्रो0 परमेन्द्र सिंह
विषय: “परंपरागत खेती का नवीन तकनीकों के साथ समन्वय द्वारा वर्ष 2047 तक विकसित उत्तर प्रदेश” पर विस्तृत दृष्टिकोण पर पत्रकार वार्ता के दौरान प्रो0 परमेन्द्र सिंह ने कहा कि परंपरागत कृषि ज्ञान एवं नवाचार का संगम ही विकसित भारत का आधार बनेगा ।
उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद, लखनऊ के उप महानिदेशक प्रो. परमेन्द्र सिंह ने “परंपरागत खेती का नवीन तकनीकों के साथ समन्वय के माध्यम से ही वर्ष 2047 तक विकसित उत्तर प्रदेश” विषय पर विस्तृत विचार व्यक्त करते हुए कहा कि कृषि केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संतुलन का आधार है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में उत्तर प्रदेश की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह देश का सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य होने के साथ-साथ कृषि उत्पादन का प्रमुख केंद्र भी है।

प्रो. सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि उत्तर प्रदेश की कृषि प्रणाली सदियों से परंपरागत ज्ञान, स्थानीय संसाधनों और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित रही है। हमारे किसानों ने बिना आधुनिक संसाधनों के भी टिकाऊ खेती की परंपरा विकसित की, जिसमें मिट्टी की उर्वरता, जल संरक्षण और जैव विविधता का विशेष ध्यान रखा गया। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन परंपरागत प्रणालियों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़कर एक समन्वित कृषि मॉडल विकसित किया जाए, जो न केवल उत्पादन बढ़ाए बल्कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा भी करे।
उन्होंने कहा कि परंपरागत खेती की प्रमुख विशेषताओं में देशी बीजों का उपयोग, मिश्रित एवं बहुफसली खेती, जैविक खादों का प्रयोग, प्राकृतिक कीट नियंत्रण तथा जल संरक्षण की तकनीकें शामिल हैं। ये सभी तत्व आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक हैं, विशेषकर तब जब कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, मृदा क्षरण और जल संकट जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। प्रो. सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल परंपरागत तरीकों पर निर्भर रहकर वर्तमान समय की बढ़ती खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करना संभव नहीं है। इसलिए आधुनिक तकनीकों का समावेश अनिवार्य है।
उन्होंने बताया कि प्रेसिजन फार्मिंग, ड्रोन तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IOT), मृदा स्वास्थ्य कार्ड, उन्नत बीज प्रौद्योगिकी, माइक्रो-इरिगेशन प्रणाली और डिजिटल कृषि प्लेटफॉर्म जैसी तकनीकें कृषि को अधिक उत्पादक, कुशल और लाभकारी बना सकती हैं। उन्होंने विस्तार से बताया कि समन्वित कृषि मॉडल में परंपरागत और आधुनिक दोनों दृष्टिकोणों का संतुलित उपयोग आवश्यक है। उदाहरण के रूप में, देशी बीजों को उन्नत किस्मों के साथ समायोजित कर जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है। इसी प्रकार, जैविक खादों के साथ मृदा परीक्षण आधारित उर्वरकों का संतुलित उपयोग करके मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखते हुए उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
मिश्रित खेती को आधुनिक डेटा विश्लेषण और GIS आधारित फसल योजना के साथ जोड़कर जोखिम को कम किया जा सकता है और आय को बढ़ाया जा सकता है। प्रो. सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कृषि के विकास के लिए क्षेत्रीय विविधता को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनानी होंगी। बुंदेलखंड क्षेत्र में जल संरक्षण और सूखा सहनशील फसलों पर ध्यान देना होगा, जबकि तराई क्षेत्र में जल निकासी और उन्नत धान उत्पादन तकनीकों को अपनाना आवश्यक होगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश में बाढ़ प्रबंधन और उपयुक्त फसल चक्र विकसित करना होगा, जबकि पश्चिमी क्षेत्र में उच्च मूल्य वाली फसलों और बागवानी को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को देखते हुए “क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर” को प्राथमिकता देना अत्यंत आवश्यक है। इसके अंतर्गत मौसम आधारित सलाह, सूखा एवं बाढ़ सहनशील किस्मों का विकास, जल प्रबंधन तकनीकों का उपयोग तथा कृषि वानिकी को बढ़ावा देना शामिल है। प्रो. सिंह ने डिजिटल कृषि के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि किसानों तक सही समय पर सही जानकारी पहुंचाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। मोबाइल ऐप, डिजिटल प्लेटफॉर्म, किसान कॉल सेंटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सलाह प्रणाली के माध्यम से किसानों को मौसम, बाजार, कीट प्रबंधन और पोषण प्रबंधन की जानकारी दी जा सकती है।

इससे निर्णय लेने की क्षमता में सुधार होगा और जोखिम कम होगा। उन्होंने किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि छोटे और सीमांत किसानों की संख्या अधिक होने के कारण व्यक्तिगत स्तर पर तकनीकों को अपनाना कठिन होता है। ऐसे में FPOs के माध्यम से सामूहिक खेती, सामूहिक विपणन और संसाधनों का साझा उपयोग किया जा सकता है, जिससे लागत कम होगी और लाभ बढ़ेगा। प्रो. सिंह ने कृषि-उद्यमिता को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि युवाओं को कृषि के प्रति आकर्षित करने के लिए एग्री-स्टार्टअप्स, एग्री-बिजनेस इन्क्यूबेशन सेंटर और स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों को बढ़ावा देना होगा।
इससे न केवल रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि कृषि में नवाचार को भी प्रोत्साहन मिलेगा। उन्होंने महिला किसानों की भूमिका को भी रेखांकित करते हुए कहा कि कृषि में महिलाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और तकनीकी जानकारी प्रदान करके कृषि विकास में उनकी भागीदारी को और मजबूत किया जा सकता है। प्रो. सिंह ने यह भी कहा कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मृदा और पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना आवश्यक है।
उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य में जैविक खेती के क्लस्टर विकसित किए जाएं और उन्हें बाजार से जोड़ा जाए, ताकि किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त हो सके। उन्होंने कहा कि “एक जिला एक उत्पाद” जैसी योजनाओं के माध्यम से स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। इससे किसानों की आय में वृद्धि होगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। प्रो. सिंह ने कृषि अनुसंधान और विस्तार तंत्र को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि अनुसंधान संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों और किसानों के बीच मजबूत समन्वय स्थापित करना होगा, ताकि नई तकनीकों का तेजी से प्रसार हो सके।
उन्होंने यह भी कहा कि 2047 तक विकसित उत्तर प्रदेश के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार, निजी क्षेत्र, अनुसंधान संस्थान और किसानों के बीच साझेदारी आवश्यक है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी (च्च्च्) मॉडल के माध्यम से कृषि अवसंरचना, भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन सुविधाओं का विकास किया जा सकता है। प्रो. सिंह ने आगे कहा कि कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाना भी अत्यंत आवश्यक है। सिंचाई, ग्रामीण सड़कें, कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसिंग और फूड प्रोसेसिंग इकाइयों का विकास कृषि को अधिक लाभकारी बनाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि कृषि शिक्षा में सुधार की आवश्यकता है, ताकि छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण मिल सके। इससे भविष्य में कुशल कृषि विशेषज्ञों की उपलब्धता सुनिश्चित होगी। प्रो. सिंह ने अपने वक्तव्य में यह स्पष्ट किया कि 2047 तक विकसित उत्तर प्रदेश का लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें किसानों की आय, पर्यावरण संरक्षण, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण विकास को भी शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि परंपरागत ज्ञान और आधुनिक तकनीकों का समुचित समन्वय किया जाए, तो उत्तर प्रदेश कृषि के क्षेत्र में एक नया मॉडल प्रस्तुत कर सकता है, जो न केवल देश के लिए बल्कि विश्व के लिए भी उदाहरण बन सकता है।
अंत में, प्रो. सिंह ने विश्वास व्यक्त किया कि सभी हितधारकों के संयुक्त प्रयासों से उत्तर प्रदेश कृषि क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा और 2047 तक विकसित राज्य बनने के लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल करेगा।
