कर्म की कसौटी      Publish Date : 18/04/2026

                   कर्म की कसौटी

                                                                                                         प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

हम सबको महाभारत से एक बड़ी सीख मिलती है कि विजय केवल बाहुबल, अस्त्र-शस्त्र या सत्ता से ही प्राप्त नहीं होती, बल्कि सिद्धांत, धर्म और सत्य के माध्यम से प्राप्त होती है। सही और गलत का का चुनाव ही मनुष्य का इतिहास में स्थान निर्धारित करता है। भीष्म पितामह महाभारत के सबसे शक्तिशाली और आदरणीय योद्धाओं में से एक थे, किंतु इसके बावजूद वे गलत सिंहासन के साथ खड़े रहे। उन्होंने यह जानते हुए भी कि कौरव अधर्म के मार्ग पर हैं, हस्तिनापुर, की सत्ता और अपनी, प्रतिज्ञा को धर्म से ऊपर रख दिया। भीष्म का पतन इस बात का प्रतीक है कि जब शक्ति सिद्धांत से अलग हो’जाती है, तो वह हार में बदल जाती है।

द्रोणाचार्य विद्या, ज्ञान और गुरु-परंपरा के प्रतीक थे, किंतु उनका ज्ञान भी उन्हें धर्म के मार्ग पर नहीं रख सका। पुत्र मोह और पक्षपात ने उनके विवेक को ढक लिया। उन्होंने यह जानते हुए भी कि दुर्योधन अन्याय कर रहा है, उन्होंने भी उसके पक्ष में युद्ध किया। द्रौणाचार्य का अंत यह दर्शाता है कि विद्वता तब तक अधूरी है, जब तक वह निष्पक्षता और सत्य से जुड़ी न हो। कर्ण के पास भी हर वह अवसर था कि वह सत्य का साथ चुने। परंतु उसने मित्रता और कृतज्ञता के नाम पर अधर्म का साथ दिया। उसने सत्य को पहचानने के बाद भी गलत का साथ नहीं छोड़ा।

                           

इस प्रकार से देखा जाए तो महाभारत का संदेश यही है कि गलत के साथ खड़े रहकर कोई भी व्यक्ति महान नहीं बन सकता। चाहे वह कितना ही शक्तिशाली, ज्ञानी या वीर क्यों न हो। इतिहास कर्मों को देखता है। जो व्यक्ति अधर्म के पक्ष में खड़ा होता है, उसका नाम इतिहास में पराजितों की सूची में दर्ज होता है। इसलिए जीवन में तटस्थ रहना भी कई बार अधर्म का समर्थन बन जाता है।

सही के साथ खड़े होने के लिए साहस चाहिए, त्याग चाहिए और कभी-कभी अपनों के विरुद्ध जाने का संकल्प भी चाहिए। अंततः विजय उसी की होती है, जो सिद्धांतों से समझौता नहीं करता।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।