सबकी अपनी- अपनी सीमाएं      Publish Date : 13/04/2026

            सबकी अपनी- अपनी सीमाएं

                                                                                                           प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

हम हर रोज अपने जीवन में अनुभव कर रहे हैं की जैसे ही कोई अपनी सीमाओं को पार करता है, तुरंत हम असहज हो जाते हैं। आशय स्पष्ट है इस प्रकृति में सभी के लिए सीमाएं निश्चित है जो सीमाओं से परे है वह केवल ब्रह्म या ईश्वर है।

प्रकृति में उपलब्ध संसाधनो के उपयोग की भी सीमा है, आए दिन कोई ना कोई संकट किसी न किसी रूप में हमारे सामने खड़ा दिखाई देता है कहीं शुद्ध वायु शुद्ध जल तो कहीं हमारे साधनों के लिए पेट्रोलियम, इनकी कमी होते ही ऐसा लगता है मानो हम ऐसे संकट में जाने वाले हैं जहां जीवन का अंत तुरंत है। कुछ संसाधन तो हमारे जीवन के लिए अनिवार्य है तो कुछ हमारे जीवन के सरलीकरण के लिए अनिवार्य हैं, भारतीय दर्शन ने इन संसाधनों के प्रति मनुष्य को दोहन की दृष्टि रखने का संदेश दिया है लेकिन वही पश्चिम की दृष्टि ने इन संसाधनों के प्रति शोषण की दृष्टि हमें प्रदान की।

बच्चा अपनी मां के दूध पर पलता है वहीं से यह दोहन शब्द आया है जिससे मां भी स्वस्थ रहती है और बच्चे का पोषण भी होता है। प्रकृति भी हमारे लिए मां के जैसी ही है अतः प्रकृति से प्राप्त संसाधनों के प्रति हमें वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जिससे मां भी स्वस्थ रहे और हम भी पोषण प्राप्त कर सकें। हजारों वर्ष पुराना अपना देश अपने इन्हीं मूल्य केंद्रित परंपराओं के कारण ही प्राकृतिक और मानव निर्मित संकटों का सामना करते हुए अपनी सभ्यता को जीवित रख सका है।

मनुष्य से लेकर के समाज तक के जीवन में भी उतार-चढ़ाव तो आएंगे लेकिन ऐसे में जिस समाज ने प्रकृति के साथ अपना जीवंत संबंध स्थापित रखते हुए अपने उपभोग की सीमाओं का ध्यान रखा वह मनुष्य और वह समाज सभी संकटों को परास्त करने में समर्थ होता है क्योंकि हमारी शक्ति का वास्तविक स्रोत तो प्रकृति ही है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।