
धार्मिक व्यक्ति Publish Date : 25/03/2026
धार्मिक व्यक्ति
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
किसी भी वस्तु, व्यक्ति या उसके विचार की प्रकृति उसके कुछ विशिष्ट गुणों के माध्यम से निर्धारित होती है। धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति की पहचान भी उसके गुणों के आधार पर ही होती है और इनमें सबसे महत्वपूर्ण गुण धैर्य है। धैर्य का अर्थ है- किसी भी परिस्थिति में विचलित न होना। परेशान होना, घबराना या अधीर हो जाना मनुष्य के लिए न तो उचित है और न ही हितकारी।
एक धार्मिक व्यक्ति हर स्थिति में शांत ही बना रहता है, वह वर्तमान को समझता है और भविष्य के लिए स्वयं को तैयार करता है।
धैर्य के बाद आता इच्छाओं का दमन या आत्मसंयम। दमन का अर्थ है स्वयं पर नियंत्रण, जबकि शमन होता है दूसरों पर नियंत्रण। जो व्यक्ति समाज में फैले अन्याय, अराजकता और असामाजिक गतिविधियों के विरुद्ध संघर्ष करता है, वह शमन करने वालाश् कहलाता है। जबकि जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं, वासनाओं, क्रोध और लोभ को नियंत्रित करता है, वही दमन करने वाला है। अतः इस प्रकार से एक धार्मिक व्यक्ति में दमन का गुण अवश्य होना चाहिए, क्योंकि बिना आत्मसंयम के धर्म की कल्पना भी अधूरी ही होती है।

अस्तेय हमारी आचार संहिता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है। अस्तेय का अर्थ है- चोरी न करना। दूसरों की वस्तु, धन या अधिकार छीन लेना बाहरी चोरी है। जबकि आंतरिक चोरी मन में होती है- जैसे ईर्ष्या, अनुचित लाभ की इच्छा या किसी का हक छीनने की मानसिक प्रवृत्ति।
अतः इस प्रकार हमें विचार, वाणी और कर्म, तीनों स्तरों पर चोरी से बचने का प्रयास करना चाहिए और यही भाव शौच का भी है। शौच का अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं है। वास्तविक शौच है- अपने मन की पवित्रता को बनाए रखना और साथ ही शारीरिक स्वच्छता को भी बनाए रखना। मन को शुद्ध रखने के लिए दो मार्ग बताए गए हैं- बाहरी और आंतरिक। बाहरी मार्ग है स्वयं को निरंतर अच्छे कर्मों में लगाना। अर्थात निःस्वार्थ सेवा और पुण्य कर्म करना। आंतरिक मार्ग है- अपने लक्ष्य और ईष्ट का निरेतर स्मरण करना। बाह्य रूप से समाज सेवा और आंतरिक रूप से श्रद्धा, इन, दोनों से हमारा मन शुद्ध बना रहता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
