
समय बदला है, सपने नहीं Publish Date : 24/03/2026
समय बदला है, सपने नहीं
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं सरिता सेंगर
जब बच्चे पढ़ाई या करियर के लिए घर से दूर निकलते हैं, तो माता-पिता के जीवन में एक अनकहा सन्नाटा उतर आता है। यह उदासी स्वाभाविक है, लेकिन यही खालीपन तनाव बन जाए, तो रुककर सोचना जरूरी है। सवाल यह नहीं कि बच्चे चले गए। सवाल यह है कि अब इस खाली समय को कैसे नई ऊर्जा से भरा जाए।
कुछ बदलाव अपना कर जीवन को दोबारा कैसे संवारा जा सकता है, पिछले सप्ताहांत, जब मेरे पति और मैं रविवार के दिन एक रेस्तरां में खाना खा रहे थे, तो मेरी एक दोस्त ने हंसते हुए कहा था-अरे शुभ्रा, तुम तो बच्चों को बाहर भेजकर खूच खुश नजर आ रही हो। जब देखो घूमने निकल जाती हो। हालांकि, मेरी दोस्त गलत नहीं थी। हां, मैं इसे जी रही हूं, लेकिन यह कोई नई शुरुआत नहीं है।
अपने सबसे छोटे बेटे के जाने के बाद अपने लिए एक नई शुरुआत करने वाली शुभ्रा ने अकेलेपन की बोत छेड़ने पर अपना हाल कुछ ऐसे शब्दों में बताया था। पढ़ाई के लिए जब बच्चे बाहर चले गए, तो वह भी काफी उदास रहने लगी थीं। पूरा घर खाली-खाली सा लगने लगा था। वह कहती हैं, श्शायद एम्प्टी नेस्ट की भावना ने ही मुझे चुनौती लेने की हिम्मत दी। खालीपन सिर्फ तब लगता है, जब हम एक जगह ठहर जाते हैं। अगर हम इसे एक मौका मान लें, कुछ नया शुरू करने का, खुद से दोबारा मिलने का, उन सपनों को छूने का, तो जिंदगी बदल सकती है।

आज मैं आराम में भी हूं और खुशहाल भी। यह सब संभव हुआ, जब मैं डर से भागने के बजाय अपने खाली समय को बेहतर बनाने में लग गई। शुभ्रा की यह सकारात्मकता बताती है कि कैसे खुद के लिए जिया जाए।
क्या होता है एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम
जब बच्चे पढ़ाई या करियर के लिए घर से दूर उड़ान भरते हैं, तो माता-पिता का मन भारी होना स्वाभाविक है। बरसों से भरा-पूरा घर अचानक शांत होने लगता है और भीतर एक अजीव-सा खालीपन उतर आता है। कुछ लोग इस बदलाव को पहले से समझ लेते हैं, लेकिन कई के लिए यह दौर भावनात्मक संघर्ष बन जाता है यही है श्एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम। मनोचिकित्सक कैप्लान और सैडॉक अनुसार, एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम एक भावनात्मक अवस्था है।
यह एक तरह का प्रतिक्रियात्मक अवसाद है, जो मां-पिता दोनों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, कुछ माता-पिता इसे सहजता से अपना लेते हैं, जबकि कई लोग अकेलेपन, उदासी और उद्देश्य की कमी महसूस करते हैं खासतौर पर माताएं। पश्चिमी समाज में बच्चों का घर छोड़ना सफल पालन-पोषण माना जाता है, जबकि हमारे यहां पारिवारिक जुड़ाव मजबूत होने से यह पैरेंट्स के लिए भावनात्मक रूप से कठिन दौर होता है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, यह अकेलापन, सामाजिक अलगाव, मानसिक तनाव के साथ-साथ बुढ़ापे में शारीरिक बीमारियों का भी जोखिम बढ़ाता है। जो लोग इसे अपने जीवन की दूसरी पारी मान कर खुद को दूसरे कामों में व्यस्त रखते हैं, वो मध्य उम्र में भी खुश रहते हैं।
जीवन के बदलाव को स्वीकारें

विशेषज्ञ के अनुसार, इससे उबरने के लिए संवाद बनाए रखना और खुद पर ध्यान देना बेहद जरूरी है। इस बाबत लाइफ कोच सलोनी सिंह बताती हैं, बच्चों के दूर जाने जैसे बदलावों से तालमेल बैठाने में समय लगता है। ऐसे में माता-पिता को धैर्य रखते हुए अपने जीवन की नई योजना बनानी चाहिए। माता-पिता को पहले से ही खुद को मानसिक और भावनात्मक रूप से बदलाव के लिए तैयार करना चाहिए।
बच्चों की परवरिश और उनके भविष्य के लिए जो करना था, वह उन्होंने पूरी निष्ठा से किया। अब नए शौक अपनाने, पढ़ाई या करियर दोबारा शुरू करने, स्वयं सेवा जैसे कामों से जुड़ने का वक्त है। इस खालीपन को डर का कारण नहीं, बल्कि आत्म-खोज का अवसर समझना जरूरी है।
अपनी रुचियों को पहचानें
- जिन कार्यों के लिए पहले आपके पास फुरसत नहीं होती थी, अब आपके पास उनके लिए पर्याप्त समय है, तो अपनी रुचि से जुड़े। जब आप अपनी हॉबी से जुड़ा कोई काम शुरू करेंगे, तो निश्चत रूप से आपको अच्छा. महसूस होगा।
- आपकी कोशिश यही होनी चाहिए कि हमेशा खुश व सक्रिय रहे। जीवन के प्रति उदासीनता आपकी मानसिक सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। इसलिए हमेशा व्यस्त रहे। इस तरह जब आप अपनी स्थिति को सहजता से स्वीकार लेंगे, तो आपको उदासी महसूस नहीं होगी।
- दोस्ती बढ़ाएं, समूहों से जुड़े और उन लोगों से संवाद करें, जो इसी दौर से गुजर रहे हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
