एक अकेला      Publish Date : 19/03/2026

                      एक अकेला

                                                                                                             प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

सुप्रसिद्व कहावत है- कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। काफी हद तक यह बात सही भी है, परन्तु सही मायनों में देखा जाए तो एक अकेला सूर्य ही पूरे जगत को प्रकाशित करता है और चंद्रमा अनगिनत तारों के साथ भी वैसा प्रकाश नहीं कर पाता। मनुष्य इस संसार में आता और जाता भी अकेला ही है। अपने पैरों का भरोसा ही उसका सच्चा साथ देता है। बहादुर और महापुरुष किसी आश्रय की प्रतीक्षा नहीं करते। वे अपने कदमों से अकेले ही अपनी मंजिल तय करते हैं। संगी-साथी आरंभ में साथ रहते हैं, पर कई बार राह में पीछे छूट जाते हैं।

                                      

यदि आप उस स्थिति में खड़े हैं, जहां सभी ने आपका साथ छोड़ दिया हो, आपसे मुंह मोड़ लिया हो, आपसे नाता तोड़ लिया हो, तो निराश होने अथवा घबराने की आवश्यकता नहीं। आपसे पहले भी अनेक लोग अकेले चल चुके हैं और अपने पैरों पर जीवन-यात्रा तय कर चुके हैं। आप अकेले हैं- इस सत्य को स्वीकार कर लेना आपके लिए वरदान सिद्ध होगा। इसका सदुपयोग कीजिए। महान व्यक्ति जो चीज खोजते हैं, वह उन्हें अपने भीतर मिलती है, जबकि कमजोर लोग दूसरों का मुंह ताकते रहते हैं। अपने ऊपर निर्भर रहकर ही मनुष्य जीवन में सत्य का साक्षात्कार करता है और कुछ प्राप्त करता है।

मनुष्य को दो प्रकार से शिक्षा मिलती है- एक दूसरों के कहने-सुनने अथवा अध्ययन से और दूसरी शिक्षा जीवन और जगत की खुली पुस्तक से अर्थात अपने अनुभवों से। इनमें दूसरी प्रकार की शिक्षा ही स्थायी होती है। पहली शिक्षा केवल ऊपरी सहायता प्रदान करती है। यही कारण है कि आज ऊंची-से-ऊंची बातें कही और पढ़ी तो जाती हैं, पर उनका वास्तविक लाभ बहुत कम लोगों को मिलता है। उनसे वही व्यक्ति लाभ उठा सकता है, जो स्वयं निर्माणशील बुद्धि का प्रयोग करता है। अतः चाहे व्यापार, शिक्षा हो या उद्योग आविष्कार और उपार्जन के सभी क्षेत्रों में वही व्यक्ति आगे बढ़ सकता है, जो अकेलेपन को दुर्बलता नहीं, बल्कि शक्ति मानकर उसका प्रयोग करना जानता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।