
राष्ट्र को दृढ़ और संगठित बनाने का शताब्दी पर्व Publish Date : 13/03/2026
राष्ट्र को दृढ़ और संगठित बनाने का शताब्दी पर्व
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
1925 में नागपुर की पुण्यभूमि पर डॉ. कैशव बलिराम हेडगेवार जी ने राष्ट्र जागरण का एक दीप प्रज्वलित किया। एक शताब्दी पूर्व प्रज्वलित वह छोटी-सी ज्योति आज विश्य के सबसे बड़े स्वयंसेवी सांस्कृतिक संगठन 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' के रूप में अखंड राष्ट्रदीप बनकर भारत की आत्मा को आलोकित कर रही हैं। संघ का जन्म किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की पुकार के रूप में हुआ। डॉ. हेडगेवार ने अनुभव किया कि स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब समाज भीतर से दृढ़, संगठित और चरित्रवान बनेगा।
भारतभूमि आदिकाल से ही त्याग, तप और धर्म का अखंड सोत रही है। इस धरा के पर्वतों में प्रऋषियों की साधना संचित है, नदियों में सेटों की ऋनाएं प्रथाहित होती है और वायु में सनातन संस्कृति का शांत संदेश गूंजता है। इतिहास साधी है कि जब-जब इस पुण्य भूमि पर संकट का अंधकार छापा, तब-तब कोई ज्योति प्रज्वलित होकर जनमानस को जागृत करती यहीं। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में भी ऐसा ही समय था।
एक और पराधीनता की की बेड़ियों ने राष्ट्र की आमा को कुणाल दिया था. दूसरी ओर विभाजनकारी प्रवृतियां और सांस्कृतिक दिग्धम समाज को दिशाहीन बना रहे थे। राष्ट्र जीवन बाराह रहा था और जनमानस भ्रमित होकर निसाहाय प्रतीत होता था। ऐसे ही विषम समय में विजयदशमी के पावन पर्व पर, 1925 में नागपुर की पुण्यभूमि पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने राष्ट्र जागरण का एक दीप प्रज्वलित किया। एक शताब्दी पूर्व प्रज्वलित यह छोटी-सी ज्योति आज विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में अखंड राष्ट्रदीप बनकर भारत की आत्मा को आलोकित कर रही है।

संघ का जन्म किसी राजनीति का महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि भारी आमा की पुकार के रूप में हुआ। डॉ. हेडगेवार ने अनुभव किया कि स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब समाज भीतर से दूह, संगठित और परिजवान बनेगा। उन्होंने संकल्प लिया कि ऐसे नागरिक तैयार किए जाएं, जिनकी आस्था सनातन भारतीय मूल्यों में युछ ही, जो मां के आराधक हो हो और जिनके जोबन का लक्ष्य राष्ट्र सेवा हो। जो पह उद्घोष कर सकें, राष्ट्रायस्वाहा, इदं राष्ट्राम इदं न मम।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा इस्वलाए मात्र खेलकूद या व्यायाम का स्थान नहीं है, अपितु परित्र निर्माण की कार्यशाला है। यहां अनुशासन और सहयोग का पाठ पढ़ाया जाता है। यहां सेवा और समर्पण के बीज बोए जाते हैं। भगवा ध्वज के समक्ष सर्वदा वंदन मातृभूमि को, इस गीत का सामूहिक गायन प्रत्येक स्वयंसेवक के क के हृदय में यह संकाय दृढ़ करता है कि उसका जीवन किसी साध्य का साधन नहीं, अपितु राष्ट्र हितार्थ समर्पित माधना है। यह NT% प्रार्थना मात्र उच्चारित शब्द नहीं, अपितु राष्ट्र-कार्य का आस्थान है, जो प्रायेक स्वयंसेवक को भारत माता की सेवा हेतु प्रेरित करता है।
संघ के सौ वर्ष केवल संगठनात्मक विस्तार से कहीं अधिक, इसकी अनुशासित शाखाओं, सतत सेवा और राष्ट्र निर्माण के प्रति समर्पण के प्रमाण हैं। आज, 51,000 से अधिक स्थानों पर इसकी 63,000 शाखाएं और शिक्षा, कल्याण, स्वावलंबन, आमोदय और आपदा-राहत के क्षेत्र में कार्यरत 1,29.000 से अधिक से सेवा केंद्र हैं। महान शिक्षाविद रानांनी देशमुख की तरफ स्थापित सरस्वती शिशु मंदिर आज भारतीय मौलिक और आधुनिक शिक्षा का सबसे बड़ा केंद्र है। यह संध को केवल एक संगठन नहीं, बल्कि भारत की आंतरिक शक्ति और जीवंत चेतना का प्रतीक बनाता है।

राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं सांस्कृतिक पुनर्जागरण भी उद्देश्य: स्वतंत्रता के बाद जब राजनीति सजा-मपपं और व्यक्तिगत लाभ की और शुकने लगी, तो समाज में निराशा और विखंडन की आशंकाएं हुई। उस दौर में भी, संघ ने अपने संगठन और सेवा के माध्यम से राष्ट्र की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में प्रवाहित किया। इसने देश को सिखाया कि राष्ट्र निर्माण केवल संसदीय बहसों या सरकारी नीतियों से नहीं बल्कि समाज के हर स्तर पर अनुशासित, सदाचारी और चरित्रवान नागरिकों के निर्माण से होगा। संघ का मानना था कि स्वतंत्रता का अर्थकेवल राजनीतिक स्वतंत्र नहीं सकृतिक पुनर्जागरण और आध्याति भी है।
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, संघ के स्वयंसेवकों ने स्वेच्छा से राष्ट्र सेवा की। उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों के लिए राहत शिविरों चिकित्सा स्वापा और रसद की व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपतकाल के दौरान जन मनोवल बनाए रखने और अनुशासन बनाए रखने में स्वयंसेवकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह इसका एक उदाहरण है। संघ केवल एक संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का एक माध्यम है। प्राकृतिक आपदाओं के समय भी संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले सहायता के लिए आगे आते हैं।
उनके लिए जान लिंग का कोई भेदभाव नहीं है। पूरा समाज ही उपका परिचार है और पूरा भारत उनका घर है। राज्य के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रेरक मार्गदर्शन अतुलनीय है। संघ ने अपने अनुशासित स्वयंसेवकों और संगठित प्रयासों से इस ऐतिहासिक कार्य का नेतृत्व किया। यह केवल एक आंदोलनबोध के आल्वान को पूर्ण परिणति थी।
वैचारिक शक्ति और समाज सेवा के आदर्श से पोषित हुआ संगठन: संघ ने सुनिश्चित किया कि यह प्रयास शांतिपूर्ण, व्यवस्थित और अनुशासित तरीके से संचालित हो, जिससे न केवल लोगों की शिक्षा बड़े ब राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पहचान को भी प्रबल समर्थन मिले। इस महान युग में संघ का घोगदान दर्शाता है कि सगद्धन न केवल सेवा और अनुशासन के सिद्धांतों को कायम रखा है, बॉल्या राष्ट्रीय और साकृतिक कार्यों के लिए एक सतत प्रेरक शक्ति के रूप में भी कार्य करता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
