
एक बोध कथा Publish Date : 11/03/2026
एक बोध कथा
एक बार एक व्यक्ति की जेब में दो दो हजार रूपये और एक रूपये का सिक्का एक साथ हो गए। सिक्का अभिभूत होकर दो हजार के नोट को देखे ही जा रहा था। इस दो हजार के नोट ने सिक्के से पूछा कि तुम इतने ध्यान से क्या देख रहे हो?
सिक्के ने जवाब दिय कि आप के जैसे इतने अधिक मूल्यवान नोट से कभी मिले नहीं हैं इसलिए, ऐसे देख रहा हूँ, आप जन्म से अभी तक कितना घूमे-फिरे होंगे।
आपका मूल्य, हमारे मूल्य से हजारों गुणा अधिक है। आप कितने लोगों के लिए उपयोगी सिद्व हुए होंगे।
इस प्रर दोहजार के नोट ने दुःखी होकर कहा कि जैसा तुम सोचते हो वैसा कुछ भी नहीं है। मैं ण्क व्यापारी की तिजौरी में कई दिनों तक बन्द रहा था। एक दिन उस व्यापारी ने अैक्स चोरी से बचने के लिए घूस के रूप में एक अधिकारी के हवाले कर दिया, तो मैने सोचा कि चलो कैद से मुक्त हुए। अब तो किसी के लिए उपयोगी होंगे ही, परन्तु उस अधिकारी ने भी मुझे बैंक लॉकर कैद कर दिया।
महीनों के बाद इस अधिकारी ने एक बंगला खरीदने के लिए हमें एक बिल्डर के हाथों में सौंप दिया गया। उस बिल्डर ने हमें एक बोरे में बांधकर एक अंधेरी कोठरी में बन्द कर दिया। वहां तो हमारा श्वास फूलने लगा और हम तड़पते रहे। किसी तरह से अभी कुछ दिन पहले ही इस आदमी की जेब में हम पहुँचे हैं। सच कहूँ तो मैं अपनी पूरे जीवन काल जेल में ही कैद रहा हूँ।
दो हजार के नोट ने अपनी बात पूरी करते हुए एक के सिक्के से पूछा, दोस्त तू बता जन्म से अब तक कहाँ-कहाँ घूमें-फिरे, किस-किस से मिले? तो सिक्के ने घबड़ाते-घबड़ाते कि दोस्त, मैं अपनी क्या कहूँ? हम तो एक जगह से दूसरी, तीसरी, चौथी और ऐसे ही सतत घूमते-फिरते ही रहे।
कभी किसी भिखारी के कटोरे में तो कभी किसी बिस्कुट वाले के पास, कभी बच्चो के पास तो कभी किसी चोकलेट वाले के पास। नदियों में स्नान कर तीर्थ स्थानों पर तीर्थ भी कर आए, तीर्थ पर प्रभु के चरणों में स्थान प्राप्त हुआ तो कभी आरती की थाली में जगह भी मिली। इस प्रकार हमने खूब मजे किए और जिसके पास गए उसको भी खूब मजे करवाए। सिक्के की बात सुनकर दो हजार के नोट की आँखें भर आई।
