स्व बोध की तरफ बढ़ता भारत      Publish Date : 09/03/2026

         स्व बोध की तरफ बढ़ता भारत

                                                                                                        प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

निरंतर प्रयास करने से परिवर्तन आता है यह ध्रुव सत्य है अर्थात इसे झुठलाया नहीं जा सकता है। कुछ वर्षों पूर्व 31 दिसंबर की रात्रि ऐसा लगता था जैसे दीपावली जैसा कोई त्यौहार आ गया है लेकिन विगत वर्षों में धीरे-धीरे ही सही एक बड़ा परिवर्तन दिखाई दे रहा है। सर्दी का मौसम और छुट्टियों का उपयोग अब केवल मसूरी और शिमला के लिए नहीं हो रहा है बल्कि भारत का समाज विशेष कर युवाओं का बड़ा समूह अपने तीर्थ स्थलों की तरफ मुड़ चुका है।

                                      

अयोध्या मथुरा या काशी सभी जगहों पर हिंदू युवाओं की संख्या श्रद्धालु के रूप में बढ़ रही है यह एक अच्छे परिवर्तन के संकेत हैं। 1 जनवरी को नववर्ष के शुभकामना संदेश आने भी कम हो रहे हैं। बहुत से घरों में तो अब इस बात की चर्चा ही नहीं होती कि यह कोई नववर्ष है भी।

                                      

मनुष्य का शरीर किसी के पराधीन हो तो वह उससे निकलने के लिए प्रयास करता है परिश्रम करता है युक्ति लगता है और किसी से सहायता भी मांगता है कि किसी प्रकार आजाद हो जाए परंतु जब वह मानसिक रूप से गुलाम हो जाता है तब इसकी मुक्तता के लिए वह स्वयं कोई प्रयास भी नहीं करता और यदि कोई उसे इससे मुक्त करना चाहे तो वह उसे अपना शत्रु समझता है। अतः यह मानसिक गुलामी शारीरिक पराधीनता से कहीं अधिक घातक है। अनेकों महापुरुषों एवं संस्थाओं द्वारा भारतीय समाज के स्व को जागृत करने के लिए तथा हमारे मन से हीनता के भाव को समाप्त करने का प्रयास पिछली शताब्दी में हुआ है जिसका परिणाम अब हमें प्रत्यक्ष दिखाई देने लगा है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।