आपके और हमारे विचार करने योग्य तथ्य      Publish Date : 07/03/2026

आपके और हमारे विचार करने योग्य तथ्य

 “न्यायपालिका हमारे देश के करोड़ों निर्बलों की अंतिम आस है। इसके मान-सम्मान की सुरक्षा उन लोगों की उम्मीदों की रक्षा करना ही होगा। अगर भारतीय सत्ता और समाज पर इनके संरक्षण की जिम्मेदारी है, तो इस संदर्भ में अपने हिस्से का भार अदालतों और उनके कर्ताधर्ताओं को भी उठाना होगा”।

यह हमारी न्यायपालिका की गरिमा धुमिल करने की सोची-समझी साजिश है। न्यायपालिका के प्रमुख के रूप में मेरा यह कर्तव्य है कि मैं जिम्मेदार व्यक्ति का पता लगाऊं। जब तक मैं संतुष्ट नहीं हो जाता, तब तक जांच बंद नहीं होगी।

भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत के ये शब्द अगर चौंकाते हैं, तो चेतावनी भी देते हैं। हम संस्थाओं के अभूतपूर्व क्षरण की ओर बढ़ रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप और सवालों की जंग में न्यायपालिका केवल अकेली नहीं है। संसद से सड़क तक इसके सैकड़ों उदाहरण आपको बिना ढूंढे ही मिल जाएंगे।

भरोसा न हो, तो पिछले दिनों हिमाचल में हुए हंगामे पर नजर डालकर देखिए। वहां के एक रिसॉर्ट में अचानक लगभग दो दर्जन सशस्त्र लोग घुसते हैं। वे वहां मौजूद तीन नौजवानों को जबरन अपनी गाड़ियों में डाल लेते हैं। इसके बाद सीसीटीवी रिकॉर्ड को भी कथित तौर नष्ट कर दिया जाता है। आनन-फानन में इस काम को निपटाने के बाद वह गिरफ्त में आए और तीनों नौजवानों के वाहन दिल्ली की ओर कूच कर जाते हैं।

इस घटना की सूचना प्राप्त होते ही हिमाचल प्रदेश की पुलिस सक्रिय हो उठती है और बिना समय गवाएं जगह-जगह पर नाकेबन्दी कर दी जाती है। लंबा समय गंवाए बिना धर्मपुर के पास एक नाके पर ये लोग रोक लिए जाते हैं। जिन लोगों को हिमाचल पुलिस ने रोका था, वे कोई चौर- उचक्के नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस के जवान और अधिकारी थे। उनकी पकड़ में जो नौजवान थे, वे युवा कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं। उनके विरुद्ध ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ में आपत्तिजनक प्रदर्शन करने के ‘जुर्म’ में वारंट जारी थे।

ध्यान देने की बात है कि हिमाचल में कांग्रेस की सरकार है। ऐसे में आरोप लगना स्वाभाविक है कि उन्हें हुकूमत की ओर से संरक्षण हासिल था। दिल्ली पुलिस ने अचानक छापा मारकर उसमें दखल डाल दिया।

धर्मपुर में कार्रवाई करते समय स्थानीय पुलिसकर्मियों को पता था कि जिन लोगों को वे रोक रहे हैं, वे भी उनकी तरह चर्दीधारी हैं। बाद में दिल्ली के पुलिसकर्मियों सहित गिरफ्तार नौजवानों को शिमला की अदालत में पेश किया गया। हिमाचल पुलिस का आरोप था कि दिल्ली के पुलिसकर्मियों ने प्रचलित नियम-कायदों की अवहेलना की। उन्हें न केवल हिमाचल पुलिस को सूचित करना चाहिए था, बल्कि गिरफ्तार नवयुवकों का मेडिकल परीक्षण कराने के बाद ट्रांजिट रिमांड भी लेना चाहिए था।

इस घटना की खबर पाते ही हिमाचल पुलिस सक्रिय हो उठती है। जगह-जगह नाकेबंदी कर दी जाती है।

पुलिस बनाम पुलिस’के ऐसे मामले आश्चर्यजनक तौर पर बढ़ रहे हैं। पिछले ही महीने बंगाल और उत्तर प्रदेश को पुलिस में इसी तरह की कहासुनी हुई थी। इससे पहले कोलकाता की घटना सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंची थी। इस घटना में हुआ कुछ यूं था कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारियों ने चुनाव प्रबंधन कंपनी आईपैक के स्थानीय दफ्तर पर छापा मारा था पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री भारी पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गई और जांच अधिकारियों के कब्जे से कई फाइलें ‘छीन’ली थी। ममता बनर्जी का आरोप था कि यह छापा भाजपा के इशारे पर इसलिए मारा गया, ताकि आईपैक के पास मौजूद तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिक दस्तावेज हासिल किए जा सकें। वह उन्हें लेने ही वहां गई थीं।

इससे पहले झारखंड और तमिलनाडु में ईडी अधिकारियों के खिलाफ प्रादेशिक पुलिस ने मुकदमे दर्ज कर लिए थे।

सुबूतों को कथित तौर पर नष्ट कर दिया जाता है। आनन-फानन में इस काम को निपटाकर वे गिरफ्त में आए तीनों नौजवानों के साथ दिल्ली की ओर कूच कर जाते हैं।

मैं आपको ऐसे दर्जनों विवाद याद दिला सकता हूं, जब अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर तमाम पुलिस बल या जांच एजेंसियां आमने-सामने आ खड़ी हुई, जिनसे सांविधानिक संकट की स्थिति पैदा हो गई तेरी पुलिस, मेरी पुलिस का यह द्वैत भारत के संघीय चरित्र के खिलाफ है, पर रतौंधी के शिकार सिवासतदां सुधरने को तैयार नहीं।

इस मुद्दे पर हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं, लिहाजा न्यायपालिका पर लौटते हैं।

मौजूदा विवाद एनसीईआरटी की आठवीं कक्षा की समाजशास्त्र की किताब में एक पाठ को लेकर पैदा हुआ है, जिसका शीर्षक था- न्यायपालिका में भ्रष्टाचार।

बकौल सुप्रीम कोर्ट, ‘हालांकि, किताब में हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका पर एक पूरा पाठ लिखा गया है, लेकिन यह एक झटके में सर्वाेच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और जिला अदालतों से जुड़े शानदार इतिहास को धो देता है। देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने को बनाए रखने में इन संस्थाओं के बड़े योगदान को साफ तौर पर छोड़ दिया गया है।’

इधर के कुछ वर्षों में न्यायपालिका पर हमला बोलने की प्रवृत्ति तेजी से पनपी है। आशावादी कह सकते हैं कि सोशल मीडिया के इस विस्फोटक दौर में, जब लोग ईश्वर तक को नहीं बख्शते, तब हम न्यायपालिका पर लगे आरोपों को लेकर चिंतित क्यों हैं? मैं इस तर्क से असहमत हूं। बड़े अदब के साथ कहना चाहूंगा कि अगर सिरफिरों को चुप कराना जरूरी है, तो एक बार माननीय न्यायमूर्तियों को अपने घर की भी झाडू- बुहारी करनी होगी।

बामुश्किल दो हफ्ते पहले की बात है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जारी जमानत के एक आदेश पर टिप्पणी की थी, ‘हम यह समझने में असमर्थ हैं कि हाईकोर्ट क्या कहना चाह रहा है? दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध में आरोपी के पक्ष में जमानत देने के लिए हाईकोर्ट ने किस आधार पर अपना विवेक इस्तेमाल किया?’

इसके प्रत्युत्तर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने खुद को जमानत संबंधी मामलों से बिलग करने की इच्छा जाहिर कर दी। यह नैतिकता का मामला है या असहमति का?

इसी तरह के, कई ऐसे विवादास्पद मसले हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट को अपना निर्णय सुनाना है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ही न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव से जुड़ा वाकया भी इनमें एक है। जस्टिस यादव ने 18 दिसंबर, 2024 को विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित एक सभा में समान नागरिक संहिता विषय पर बोलते हुए मुस्लिमों के विरुद्ध तथाकथित तौर पर ‘अपमानजनक’ शब्दों का प्रयोग किया था।

विवाद उठता देख सुप्रीम कोर्ट ने इसका संज्ञान लिया, लेकिन इस पर कोई फैसला नहीं हो सका, क्योंकि घटना के पांच दिन बाद ही कपिल सिब्बल समेत 55 राज्यसभा सदस्यों ने जस्टिस यादव पर ‘हेट स्पीच’ देने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए सभापति से महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने का अनुरोध कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का मामला भी सुप्रीम कोर्ट और संसद के अधीन महीनों से लंबित है।

ऐसे तमाम उदाहरण हैं। यहां पर उन सबको चर्चा संभव नहीं है। बस थोड़ा कहा, बहुत समझिए।

बताने की जरूरत नहीं कि न्यायपालिका इस देश के करोड़ों निर्बलों की अंतिम आस है। इसके मान-सम्मान की सुरक्षा उन लोगों की उम्मीदों की रक्षा होगी। अगर भारतीय सत्ता और समाज पर इनके संरक्षण की जिम्मेदारी है, तो इस संदर्भ में अपने हिस्से का भार अदालतों और उनके कर्ताधताओ को भी उठाना होगा।