
मन को छूने वाला फाल्गुन Publish Date : 03/03/2026
मन को छूने वाला फाल्गुन
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
जब इंसान ही नहीं, प्रकृति भी मस्ती से झूमने लगे, तो समझो बसंत आ गया है। बसंत फागुन मास में आता है। फागुन यानी प्रेम, उल्लास और आनंद का प्रतीक महीना। फागुन यानी बसंत ऋतु का महीना। जीवन में रंग-बिरंगे रंग भरता फागुन। इसी माह में कामदेव ने अपने प्राणों की आहुति देकर वैरागी शिव के मन में राग भरा था। राधा-कृष्ण के प्रेम के साक्षी फागुन की अलमस्त फगुनाहट के साथ प्रसिद्ध नवगीतकार उमाकांत मालवीय के ललित निबंध ‘फागुन: पाहुन सावन के गांव का’ से संपादित अंश कुछ अंश।
जब तुम्हें लगे कि तुम्हारे पोर-पोर में एक पिराती हुई मिठास पेंग भर रही है। एक प्यारी टूटन मरोड़ रेशा - रेशा भिन रही है, जब कोई पराई खुशबू तुम्हारी सांसों में तुम्हारी अपनी सगी आत्मीय होकर, घुल- मिलकर भीतर, बहुत भीतर उतर रही है। नस-नस, शिरा-शिरा, धमनियाँ उस कली की चटखन से चटख रही हैं, जिसके गाल में किसी शोख पवन ने चुटकी भर ली है और वह लाजवंती छुई-मुई दोहरी होकर चटख गई है, खिलखिलाकर खिल गई है, तो यह मानना कि मैं तुम्हारे एकदम करीब आ गया हूँ। इतना करीब कि मेरी सांसें तुम्हारे कान के लवों को छू रही हैं। इतनी पास कि तुम्हारी सांस मेरी गर्दन को सहला रही है।
इतनी सारी पहचान के बावजूद एक नाम चाहिए, जिससे तुम मुझे गाहे-बगाहे टेर सको, पुकार सको। यह टेर क्या होती है? बांसुरी जब अपनी बेखुदी में, अपनी रिक्तता में कृष्ण की महकती सांसों को मन-प्राण में एक पुलक के साथ पिरोती थी, तो ग्वाल-बाल गोपियां, राधा तो क्या, कदंब वन में पशु-पक्षी, चर-अचर, जड़-चेतन सभी एक साथ स्मंदित एवं आनंदित होते थे। टेर एक प्यास है, जिससे पपीहा ’पिउ-पिउ’ का नाम संकीर्तन करता है, स्वाति घन को टेरता है।
हाँ, तो उसी टेर के लिए तुम्हें चाहिए एक नाम तुम मुझे फागुन कह सकती हो। फागुन, जो अपने साथ सावन की अवतारणा करता है। सावन, जिसके साथ ही हमारे भीतर एक हिंडोला झुलता है, एक घटा घिरती है, अबीर- गुलाल के मेघ उमड़ते-घुमड़ते हैं, जिन्हें देखकर थिरक उठता है मन मयूर-
‘फागुन के घन गुलाल बरसो/पाहुन, तुम सावन के गांव के
घिर आए फागुन उमराव के/बेमौसम आए तो क्या हुआ
तुमने है मन कितनों का हुआ/वरसोधन, यह मुहूर्त टल रहा
कब से यूँ आज, कल कि परसों/फागुन के घन गुलाल बरसो।’ फागुन- इस नाम के साथ ही रूप का रस का गंध का, स्पर्श का, रंग का, राग का एक ऐसा आग्रह जुड़ा हुआ है कि उसे अस्वीकार कर सकना यदि असंभव नहीं, तो कठिन तो अवश्य ही है।
कभी ब्रजराज अधीर होते थे। सुना है, अब यह अधीर नहीं रहे। हाँ, तो उन्होंने कभी कहा था, कहा ही नहीं, गाया भी था ’फागुन तुम गए, मगर एक गंध छोड़ गए।’ यह गंध क्या है, वह गंध वह तो नहीं है, जिसके चलते भीतर मिसरी घुलती है, लड्डू फूटते हैं, निर्झर फूटते हैं, लहरें थिरकती हैं। वह गंध वह तो नहीं है, जिसने महर्षि पराशर को विचलित, उद्घोषित कर दिया था, जो मत्स्यगंधा सत्यवती के रूप में मूर्त हुई थी। परिणामतः युग को प्रसाद स्वरूप श्रीकृष्ण दिपायन वेदव्यास मिले थे। महर्षि पराशर के इस अवदान को, सत्यवती के इस वरदान को जमाने ने कृतज्ञतापूर्वक सिर माथे लिया था।
सुना है, ब्रजराज की देह से कस्तूरी, कर्पूर, केशर, अगरू, चंदन और कमल को मिश्रित सुगंध होती थी। यह रस है ब्रह्मा, ‘रसो वै सः।’ यह रस है, जिसके अंतर्गत ‘ताहि अहीर की छोकरियां छछिया भर छाछ पर नाच नचायें।’ जिसके अधीन सरकार कच्चे धागे में बंधे चले आते हैं। यह रस है, जीना जिंदादिली के साथ।
यह राग है, जो रेशमी रिश्तों से जोड़ता है। यह राग ही है, जिसकी विकृति हमें स्वार्थी बनाती है। यह राग ही है, जिसका उदात्तीकरण हमारे भीतर के पशु को मनुष्यता के दिव्य संस्कार से संपन्न करता है। हमें देवत्व के लिए स्पृहणीय हैसियत प्रदान करता है। यही वह विशिष्ट राग है- विराग, जिसके अधीन सारी विरक्ति, सारी उदासीनता के बावजूद ठाकुर रामकृष्ण परमहंस और संत ज्ञानेश्वर जैसे महात्मा शुष्क और नीरस नहीं होते। उनमे अहर्निश एक प्रीति का प्लावन उपस्थित रहता है।
यह रस है, जो हमें सरल तरल-ऋतु-स्निग्ध- सुकोमल बनाता है-
‘किसी फूल से लिपटी हुई/तितली को गिराकर देखो
आँधियो ! तुमने तो/दरख्तों को गिराया होगा।’
और यह स्पर्श। यह स्पर्श है- छुअन। इस छुअन की प्रतीति आहट से होती है, स्मरण से होती है। इस छुअन से अभिशप्त शिला अपनी जड़ता छोड़कर अहल्या हो जाती है। एक छुअन सतह से होकर गुजर जाती है। एक छुअन है, जो अतल तल में पैठती है, सिरहन देती है, रोमांच देती है। लोग-बाग मुसकान से छूते हैं, चितवन से छूते हैं, कनखी से छूते हैं।
हम उनकी नहीं जानते, जो अछूते रह जाते हैं। उन्हें कोई घटना, कोई सुधि, कोई गंध, कोई रूप कोई रस छू नहीं पाता। ‘वे सबसे भले’ होते हैं, उन्हें ‘जगतगति’ नहीं व्यापती। उनका ठसपन और उस ठसपन का कीमार्य अक्षत रहता है। भोज-संबंध का एक संदर्भ बाद में कौंध जाता है।
एक रूपसी धान कूट रही है। मूसल को संबोधित करके राजा भोज कहते हैं- ‘कोई कहता, तो मैं विश्वास नहीं करता। देख रहा हूं, मूसल तुम निरे काठ हो। इतने मधुर स्पर्श के बाद भी तुम रोमांच नहीं होता। तुममें सिहरन नहीं होती। तुम फूलते-फलते नहीं?’ विराग को मैं राग का विलोम नहीं मान पाया। मेरे निकट विराग विरक्ति नहीं है। विराग उदासीनता का पर्याय भी नहीं है। विराग राग का निषेध नहीं है। यह तो विशिष्ट राग है- त्यागमय भोग ही राग है। विराग की यात्रा राग से होकर ही गुजरती है।
कमलको लोग-बाग असंपृक्त कहते हैं। मुझे यह स्वयं में सत्य नहीं लगता। कमल, जल से निरपेक्ष नहीं होता। जल उसके वजूद की एक अनिवार्य शर्त होता है, वह जल सापेक्ष होता है, जल से, पंक से होता हुआ जल से ऊपर, पंक से ऊपर। नाद, ध्वनि, स्वर, आलाप जब भी एक विशिष्ट व्यवस्था के अंतर्गत संयोजित होते हैं, वे राग की रागनियों की श्रेणी में आ जाते हैं।
यह राग है, जो हमें माता-पिता, पत्नी, प्रिया, भाई-बहन, मित्र के रेशमी रिश्तों से जोड़ता है। यह राग ही है, जिसकी विकृति हमें ओछा, स्वार्थी बनाती है। यह राग ही तो है, जिसका उदात्तीकरण हमारे भीतर के पशु को मनुष्यता के भव्य-दिव्य संस्कार से संपन्न करता है और हमें देवत्व के लिए भी स्पृहणीय हैसियत प्रदान करता है। यही वह विशिष्ट राग है- विराग, जिसके अधीन सारी विरक्ति, सारी उदासीनता के बावजूद ठाकुर रामकृष्ण परमहंस, संत ज्ञानेश्वर और संत एकनाथ जैसे महात्मा शुष्क और नीरस नहीं होते। उनमें अहर्निश एक प्रीति का प्लावन उपस्थित रहता है। प्राणी मात्र का सुख-दुख उनका अपना सुख-दुख होता है।
सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है। यह हम पर निर्भर करता है कि विधाता से प्राप्त इस राग को हम अपने लिए वरदान बनाते हैं या अभिशाप। यह विराग वह महाराग है, जिसकी छांव में हम रोम-रोम भीगते हैं। और यह रंग क्या है ? यह रंगकर्म क्या है, यह रंगमंच क्या है? यह रंगनाथ, यह रंगकर्मी कौन है? ‘यत् पिंडे तत् ब्रह्मांडे।’ प्रकृति को नियंता ने विविध विधि रंगमयता से संपन्न किया है। बाहर जितने रंग हैं, वे सब हमारे भीतर के रंग हैं, परंतु हमने जो रंग बनाए हैं, वे हमारा पूरा-पूरा रूपायन करने में एकमात्र अपर्याप्त होते हैं। हमारे भीतर कभी गुलाब का रंग होता है, तो कभी गेंदे का तो कभी वासंती अथवा केसर रंग टेस्, रोली, गुलाल का रंग होता है। कभी अमलतास का पीला हल्दिया सुनहरा रंग होता है, तो कभी सरसों का पिगरी रंग होता है।

प्रस्तुतिः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
