आत्म-सुधार      Publish Date : 23/02/2026

                      आत्म-सुधार

                                                                                                             प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

वर्तमान समय में समाज आज जिस असंतुलन, तनाव और मूल्यहीनता के दौर से गुजर रहा है, उसके बीच एक नए मनुष्य की खोज अनिवार्य हो गई है। ऐसे मनुष्य की, जो सही-गलत के निर्णय में केवल तर्क नहीं, बल्कि विश्वास, विवेक और गहरे अनुभव को भी स्थान दे। आज आवश्यकता उस व्यक्ति की है, जो अपनी भूलों को स्वीकार करने का साहस रखे, उन पर पश्चाताप करे और आत्म परिष्कार के मार्ग पर आगे बढ़े। जो गलती को ढकने या सही ठहराने के बजाय उससे सीख लेकर स्वयं को बेहतर बनाए। ऐसा मनुष्य ही समाज में नैतिकता और संवेदना की पुनर्स्थापना कर सकता है।

समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हमने आवश्यकता और उपयोगिता के बीच का विवेक खो दिया है। आवश्यकता सीमित होती है, जबकि आकांक्षाएं असीम। जब संग्रह आवश्यकता से अधिक और आकांक्षा उपयोगिता से आगे निकल जाती हैं, तब जीवन और जीविका के बीच असंतुलन पैदा होता है। यह असंतुलन ही अशांति, प्रतिस्पर्धा, हिंसा और शोषण को जन्म देता है।

                              

आज का नया मनुष्य वही होगा, जो यह समझा सके कि अधिक होना श्रेष्ठ नहीं, संतुलित होना ही सार्थक है। समय, शक्ति, संपदा और प्रतिभा- ये सभी ईश्वर या प्रकृति की अमूल्य देन हैं। इनका सही नियोजन ही व्यक्ति को ऊंचा उठाता है और समाज को स्वस्थ बनाता है। यदि समय केवल दौड़ में लगे, शक्ति केवल भोग में, संपदा केवल संग्रह में और प्रतिभा केवल स्वार्थ में खप जाए, तो सभ्यता खोखली हो जाती है। नए मनुष्य का धर्म होगा- इन सबका विवेकपूर्ण, लोक मंगलकारी और मानवीय उपयोग।

इस संदर्भ में भारतीय संस्कृति हमारे लिए दीप स्तंभ है, जो अनुशासन और आत्मानुशासन की सीख देती है। भारतीय दृष्टि में हर समस्या का समाधान तलवार से नहीं, संवाद से, हिंसा से नहीं, अहिंसा से, घृणा से नहीं, प्रेम से खोजा जाता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।