
संत रविदास एक धर्म योद्धा Publish Date : 15/02/2026
संत रविदास एक धर्म योद्धा
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
माघ पूर्णिमा संवत १४३३ को जन्मे सरल स्वभाव के संत रविदास जी ईश्वर की उपासना और भक्ति का एक अद्भुत उदाहरण बन गए। वैसे संत रविदास केवल ईश्वर के भक्त थे, लेकिन उनकी रचनाएं उन्हें महान कवि भी बनाती है, उन्होंने अपनी कविता के लिए लोक भाषा चुनी जिसमें सरल संवाद करते हुए गूढ़ विषयों को बहुत सामान्यजन को समझा देते थे। जिसका परिणाम यह होता था कि जो भी उनके निकट आता था मंत्र मुग्ध हो जाता था।

जाति के आधार पर भेद को मिथ्या बताते हुए वे कहते हैं कि -
“जाति एक जामें एकहि चिन्हा, देह अवयव कोई नहीं भिन्ना।
कर्म प्रधान ऋषि-मुनि गावें, यथा कर्म फल तैसहि पावें।
जीव कै जाति बरन कुल नाहीं, जाति भेद है जग मूरखाईं”।
सामाजिक बुराइयों को समाप्त कर विदेशी शासन के द्वारा होने वाले अत्याचार के विरुद्ध समाज बलपूर्वक खड़ा हो इसकी प्रेरणा संत रविदास जी के जीवन से प्राप्त हुई। संत रैदास को मुसलमान बनाने से उनके लाखों भक्त भी मुसलमान बन जायेंगे ऐसा सोचकर धर्म परिवर्तन के लिए उन पर अनेक प्रकार के दबाव आये, किन्तु संत रैदास की श्रद्धा और निष्ठा को हम अटूट पाते हैं। सदना पीर इनको मुसलमान बनाने आया था. किन्तु इनकी ईश्वर-भक्ति और आध्यत्मिक-साधना से प्रभावित होकर सदना पीर हिन्दू होकर रामदास नाम से उनका शिष्य बन गया।
एक ओर तो वे जातिगत भेद, ढोंग, कर्मकांड आदि के विरोध में संघर्ष करते हैं, किन्तु वैदिक धर्म के दार्शनिक पक्ष में अपनी पूर्ण आस्था बराबर रखते हैं।
सिकन्दर लोदी उनको मुसलमान बनाने के लिए प्रलोभन तथा दवाब दोनों की नीति अपनाता है, लोगों को उनके पास भेजता है, किन्तु उनका उत्तर सीधा-सपाट है। वे बार -बार हिन्दू धर्म में अपनी श्रद्धा, निष्ठा तथा आस्था व्यक्त करते है। उनकी दृष्टि तथा सोच स्पष्ट है-
“वेद वाक्य उत्तम धरम, निर्मल वाका ज्ञान।
यह सच्चा मत छोड़कर, मैं क्यों पहूं कुरान।
स्रुति-सास्त्र-स्मृति गाई, प्राण जाय पर धरम न जाई।
कुरान बहिश्त न चाहिए, मुझको हूर हजार।
वेद धरम त्यागूं नहीं, जो गल चलै कटार।
वेद धरम है पूरण धरमा, करि कल्याण मिटावे भरमा।
सत्य सनातन वेद हैं, ज्ञान धर्म मर्याद।
जो ना जाने वेद को, वृथा करे बकवाद”।
(हमारे साधु संत, भाग- 1, पृ. 22-23)
धर्मपरिवर्तन से इन्कार करने पर सिकन्दर लोदी ने संत रैदास को कठोर दण्ड देने की धमकी दी तो उन्होंने निर्भीकता के साथ उत्तर दिया-
“मैं नहिं दब्बू बाल गँवारा, गंग त्याग गहूँ ताल किनारा।
प्राण तंजू पर धर्म न देऊँ, तुमसे शाह सत्य कह देऊँ।
चोटी शिखा कबहुँ नहिं त्यागँ, वस्त्र समेत देह भल त्यागँ।
कंठ कृपाण का करौ प्रहारा, चाहें डुबावो सिन्धु मंझारा”॥
आइए मुस्लिम आक्रमण के काल में भी भक्ति की निर्मल गंगा बहाने वाले संत रविदास (रैदास) को हम प्रणाम करते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
