
आत्म शोधन Publish Date : 09/02/2026
आत्म शोधन
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
संसार में माया का प्रभाव अति प्रबल है। इससे जूझने हेतु अपार बल वांछित है। बड़े-बड़े साधकों को विचलित होने में पल नहीं लगे और जीवन भर के प्रयास निरर्थक हो गए। जीवन की सार्थकता अपने अंतर बल को निरंतर विकसित करने तथा अर्जित बल को संचित रखने में है। अपनी इंद्रियों को तो वर्जित किया ही जा सकता है कि उसे कदापि वह देखना, सुनना नहीं, जो पाप कर्मों की ओर प्रेरित करे। यदि कीचड़ में खिलकर भी कमल अपनी पंखुड़ियों को कीचड़ से ऊपर रखने में सफल हो जाता है, तो मनुष्य क्यों नहीं माया में रहते हुए भी उससे विरत हो सकता है।
सारा प्रपंच पांच ज्ञान इंद्रियों और पांच कर्म इंद्रियों का है। मनुष्य या तो इनके वश में रह कर विष पान करता रहे या इन्हें वश में कर अमृत रस का धारक हो जाए। वास्तविक सत्ता तो मन है। तन तो नाशवान है, सारे रल भोग कर अंततः पंच तत्वों में विलीन हो जाएगा। पापों का बोझ तो मन अर्थात आत्म तत्व को ही उठाना और भोगना पड़ेगा। मन इस सार को समझ कर ही तन, इंद्रियों को वश में करने को दृढ़ संकल्पित हो सकता है। मन यदि बलवान है, तो मोह का स्थान प्रेम, लोभ का स्थान संतोष, काम का स्थान मर्यादा, क्रोध का स्थान विनय और अहंकार का स्थान मान ले लेगा।

प्रेम, संतोष, मर्यादा, विनय और मान- ये पांच अंकुश एक साथ लगाए रखने से ही इंद्रियों को साधा जा सकता है। मनुष्य जिस भी स्थिति में हो, वह सदैव सहज रहे। मनुष्य का संग अन्य को सुखद अनुभूति प्रदान करे। कोमलता बोली में परिलक्षित हो।
सृष्टि की सभी रचनाओं में मनुष्य का मन सर्वाधिक कोमल है। इंद्रियां जब प्रबल होती हैं तब मन की कोमलता को दुर्भावनाओं का कठोर आवरण ढक लेता है। उससे मन को मुक्त करना और सदैव मुक्त रखना वैसे ही है, जैसे किसी राज्य को जीत लेना और राज्य पर आधिपत्य बनाए रखना।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
