
अजेय विश्वास का जयघोष Publish Date : 06/02/2026
अजेय विश्वास का जयघोष
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
भारत ने एक लंबा कालखंड ऐसे शासकों के अधीन बिताया, जिन्होंने लूट के नाम पर धार्मिक विध्वंस किए, फिर भी भारतीय संस्कृति जीवित रही। सोमनाथ मंदिर इसी अजेय विश्वास का सबसे बड़ा प्रतीक है। एक हजार साल पहले भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान मिटाने के लिए किए गए कुप्रयासों के विरुद्ध भारतीयता के पुनर्जागरण की अटूट शक्ति और जीवंतता पर प्रोफेसर राकेश सिंह सेंगर के विचार-
विश्व की समस्त सभ्यताओं के अविनाशी प्रतीक एवं विश्वास होते हैं। जब यह आधार विलुप्त होते हैं, तो उक्त सभ्यता का अंत सुनिश्चित हो जाता है। इतिहास की दृष्टि से भारत एकमात्र ऐसा राष्ट्र है, जहां लगभग हजार वर्षों तक ऐसे राजनैतिक एवं सांस्कृतिक आक्रमणों के देश को झेला गया, जिसके उदाहरण कंपन पैदा करते हैं। कल्पना कीजिए कि किसी भौगोलिक क्षेत्र के लंबे कालखंड में राष्ट्र को प्रतिनिधित्व एक ऐसा राज्य कर रहा था, जिसको किसी भी रूप से राष्ट्र के प्रतिनिधि की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। इस महादेश को झेलते हुए भी भारतीय सभ्यता-संस्कृति जीवंत रही, यह निश्चित ही अद्भुत है। सोमनाथ इसका सजीव उदाहरण है।
पुनरुद्धार का संकल्प
13 नवंबर, 1947 को समुद्र का जल हाथ में लेकर जब सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार की शपथ ली, तो वे उस सभ्यता एवं विश्वास को भारतीयता के जागरण के रूप में देख रहे थे, जिसे बर्बर आक्रमणकारियों ने समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोडी थी। परंतु सोमनाथ, विश्वास की धारा में भारतीयों के मानस पटल पर जागृत थे। के. एम. मुंशी के अनुसार प्रभास पाटन, जिसे देवपाटन भी कहते है, जहां सोमनाथ मंदिर स्थित है, वह प्राच्य ग्रंथों के अनुसार सर्वाधिक महत्वपूर्ण तीर्थ है।
फिर से टूटा बर्बरता का पहाड़
गजनवी ने सोमनाथ पर बर्बरता की, किंतु सनातनियों ने इसे पुनः खड़ा कर दिया। आस्था एवं विश्वास की धरोहरपर दूसरा बर्बर आक्रमण सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी द्वारा किया गया। पुनः शिवलिंग एवं मंदिर परिसर को खंडित करते हुए आस्था पर गहरी चोट की गई। यह और भी गंभीर था, क्योंकि खिलजी और उसके वंशज गजनवी की तरह भारतं से वापस नहीं गए। बाद में वर्ष 1701 में औरंगजेब ने गुजरात के प्रमुख अपने पुत्र मौहम्मद मुअज्जम को आदेश दिया कि सोमनाथ को ऐसे ध्वस्त कर दिया जाए कि वह कभी भी पुनरुद्धार के लायक ना रहे। यह फरमान क्यों दिया गया? समझने की आंवश्यकता है।
1706 में सोमनाथ मंदिर ने पुनः तीसरा दंश झेला। यह और खतरनाक था क्योंकि इसे तोड़ यहां एक मस्जिद का निर्माण कर दिया। इन सबके बावजूद आस्था एवं सभ्यता के इस ठोस प्रतीक को जीवंत रखने का क्रम समाप्त नहीं हुआ। देवी अहिल्याबाई द्वारा पुनर्निर्माण नए रूप में कराया गया। परंतु अभी भी इतिहास को बहुत कुछ देखना था। जूनागढ़ का नवाब भारत की स्वाधीनता से पूर्व पाकिस्तान में विलय चाहता था। इस रियासत में सोमनाथ, गिरनार पर्वत, जूनागढ़ के पास संत नरसिंह की जन्मस्थली थी। जूनागढ़ कैसे बचा, किसने बचाया, इतिहास में यह दास्तान सरदार वल्लभ भाई पटेल के शौर्य और दृढ़ता के रूप में है।

स्वतंत्रता पश्चात सोमनाथ मंदिर को अपनेविशाल रूप में प्रकट होने के लिए राजनीतिक सांस्कृतिक गलियारों को अड़चनों से गुजरना पड़ा, यह सार्वजनिक है। विध्वंस के एक हजार वर्ष पश्चात आज सोमनाथ मंदिर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का एक अविनाशी स्तंभ है, यह सर्वमान्य है। सोमनाथ यह सिद्ध करता है कि भारत आध्यात्मिक तो है, परंतु विध्वंस को स्मृतियों को भी उसका जन मानस नष्ट नहीं होने देता। सोमनाथ भारत के लिए केवल विजय का नहीं, बल्कि आत्मसंतुलन और विवेक का भी प्रतीक है।
भ्रामक दावों से भरा इतिहास
12 ज्योर्तिलिंगों में प्रथम सोमनाथ महादेव के प्रमुख तीर्थ स्थले पर विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी द्वारा जनवरी, 1026 मै पहला बर्बर विखंडन किया गया, जो भारतीय जनमानस के इस विश्वास के प्रतीक पर आक्रमण था। इसकी रक्षा करते हुए 50 हजार से अधिक सनातनियों ने प्राणों की आहुति दी। इस भीषण कांड को कुछ प्रगतिवादी कहे जाने वाले इतिहासकारों ने मात्र एक लूट की संज्ञा दी (वे आश्चर्यजनक रूप से इस तथ्य को दवा गए कि गजनवी ने स्वयं को मूर्ति भंजक स्थापित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। एक तथाकथित प्रगतिवादी इतिहासकार द्वारा तो महमूद के सोमनाथ पर आक्रमण को यहां तक वैधता दी गई कि उसने सौमनाथ पर आक्रमण इस प्रयोजन से किया था क्योंकि वहां मन्नत की मूर्ति' रखी हुई है। उसका इरादा सोमनाथ की मूर्तियों को तोड़ने का कतई नहीं था। प्रश्न उठता है कि गजनवी ने मथुरा का विध्वंस क्यों किया? वहां किसकी मूर्ति होने की शंका थी? पद्मनाभ द्वारा रचित' कान्हड़दे प्रबंध' इस प्रकार के अनेक विखंडनों की चर्चा करता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
