
स्वाधीनता प्राप्ति को ले कर डॉ हेडगेवार के चिंतन की दिशा Publish Date : 27/01/2026
स्वाधीनता प्राप्ति को ले कर डॉ हेडगेवार के चिंतन की दिशा
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
वर्ष 1921 जब गांधी जी और कांग्रेस के सक्रिय समर्थन से खिलाफत आंदोलन में तीव्रता आ रही थी कांग्रेस खिलाफत आंदोलन के समर्थन के पक्ष में थी लेकिन नागपुर की कांग्रेस जो लोकमान्य तिलक के अनुयाई वाली थी को खिलाफत को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना ठीक नहीं लग रहा था।
डॉक्टर हेडगेवार भी खिलाफत के विरुद्ध थे लेकिन वह नहीं चाहते थे की देश की स्वाधीनता प्राप्ति के लिए चलने वाला गांधी जी का असहयोग आंदोलन किसी प्रकार से कमजोर पड़े अतः वे असहयोग आंदोलन को गति देने के लिए खिलाफत के समर्थक समीउल्लाह खान के साथ भी काम करने लगे। 23 फरवरी 1921 जिला कलेक्टर ने एक नोटिस जारी कर डॉक्टर हेडगेवार के सार्वजनिक भाषण और बैठक को प्रतिबंधित कर दिया लेकिन डॉक्टर हेडगेवार ने अंग्रेज सरकार के इस प्रतिबंध को दरकिनार कर असहयोग आंदोलन के लिए अपने भाषण और प्रवास जारी रखे।

अंग्रेज सरकार ने डॉक्टर हेडगेवार के खिलाफ मुकदमा चलाया, मुकदमा इस बात का था को डॉक्टर हेडगेवार राज्य सरकार के विरोध में भाषण दे रहे हैं। 5 अगस्त को अपने मुकदमे के बचाव में दिया गया भाषण और अधिक उत्तेजक था ऐसा कहते हुए 19 अगस्त कौ उन्हें 1 वर्ष की कारावास की सजा सुनाई की। जेल जाते समय उनका भाषण इस प्रकार है यह बात जितनी सच है कि किसी को भी कैद किए जाने या कालापानी भेजे जाने या फांसी पर लटकाए जाने के लिए तैयार रहना चाहिए उतनी ही सच यह बात भी है कि किसी को भी लेश मात्र भी भ्रम नहीं होना चाहिए की जेल जाना स्वर्ग में प्रवेश करने जैसा है ।
मानो कैद किए जाने का अर्थ ही स्वतंत्रता प्राप्ति है, किसी को भी निश्चित रूप से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि जेलों को भर देने से हमें स्वतंत्रता या स्वराज की प्राप्ति हो जाएगी सच्चाई यह है की जेल से बाहर रहकर भी कोई राष्ट्र की सेवा अनेक प्रकार से कर सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
