आसान नहीं है शांति की राह      Publish Date : 09/01/2026

                      आसान नहीं है शांति की राह

                                                                                                                                                          प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

अगर ट्रंप प्रशासन पुतिन को कूटनीति से ऐसी जीत दिला देता है, जो वह जंग में हासिल नहीं कर सका, तो यह अमेरिका की एक बहुत बड़ी नाकामी होगी। यूक्रेन में युद्ध की हकीकत हमें यह बताती है कि संघर्ष विराम पर बातचीत करने का यह बिल्कुल सही वक्त है। पर सवाल यह है कि क्या रूस और अमेरिका एक ऐसी शांति के लिए तैयार हैं, जो यूक्रेन को आजाद रखे। रूस पूर्वी यूक्रेन में मोर्चे पर लगातार हमला कर रहा है, और यूक्रेन लड़ाई हारने के कगार पर है।

यूक्रेनी हवाई रक्षा को अब हमलावर ड्रोन और मिसाइलों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका से मिलने वाली वित्तीय मदद भी लगभग खत्म हो गई है और जेलेंस्की की सरकार भ्रष्टाचार के मामले में फंसी हुई है। उधर रूस ने बढ़त तो बनाई है, लेकिन वह जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, उसे प्रांतों पर कब्जा करने में पांच साल और लगेंगे। फिलहाल, यूक्रेनी लाइनों को तोड़ने का कोई मुमकिन तरीका रूस के पास नहीं है। यूक्रेन ने व्यवस्थित तरीके से रूसी ऊर्जा ढांचे और तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाया।

                                                        

एक और सच्चाई है, जो मुझे 2023 में यूक्रेनी नेताओं से बात करके पत्ता चली। इसके अनुसार, यूक्रेन को तीन युद्ध लड़ने होंगे, और यह सिर्फ दूसरा है। पहला युद्ध 2014 में क्रीमिया और डोनवास इलाके के कुछ हिस्सों पर रूस का हमला था। दूसरा अभी चल रहा है, जो 2022 में शुरू हुआ था। तीसरे युद्ध के बारे में यूक्रेन को डर है। कि वह रूस तब शुरू करेगा, जब उसे फिर से हथियारबंद होने का मौका मिलेगा। उस युद्ध को जीतना, या उसे रोकना, युक्रेन की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है।

इसीलिए जेलेंस्की ने फ्रांस व स्वीडन से उन्नत लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा किया है। किसी भी शांति समझौते का मूल्यांकन एक ही सवाल के आधार पर किया जाना चाहिए कि क्या गोलीबारी बंद होने के बाद यूक्रेन आजाद रह सकता है? भले ही यूक्रेन शांति के लिए कुछ जमीन छोड़ने को तैयार हो जाए, फिर भी उसे अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता तो बनाए रखनी होगी, वरना कोई भी शांति समझौता एक समर्पण दस्तावेज से ज्यादा कुछ नहीं होगा। ट्रंप की शुरुआती योजना में पूरा डोनवास रूस को दे दिया गया था।

इसमें डोनबास के वे हिस्से भी शामिल थे, जिन्हें रूस यूक्रेन से छीन नहीं पाया था। साथ ही, यूक्रेन को नाटो में शामिल होने की उम्मीद छोड़नी होगी, और नाटो सैनिक यूक्रेन की जमीन पर तैनात नहीं हो सकेंगे। नतीजतन, समझौते में कोई भी सुरक्षा गारंटी सिर्फ कागजी होगी। अमेरिका के समर्थन के बिना, यूक्रेन के सामने दो मुश्किल विकल्प हो सकते हैं- या तो वह रूसी/अमेरिकी समझौते को मानकर मारकी का गुलाम बनकर रहे, या फिर समझौते से मना कर दे और रूस के खिलाफ मुश्किल जंग का सामना करे।

यूक्रेन बातचीत के लिए तैयार है। लेकिन जो बातें उसे मंजूर हैं, वे रूस को मंजूर नहीं हैं। ऐसे में, अमेरिकी कूटनीति और मदद का असली मकसद यूक्रेन पर पुतिन के कब्जे को रोकना होना चाहिए। यदि ट्रंप यूक्रेन को मजबूर करने की खातिर अमेरिका की आर्थिक व सैन्य ताकत का इस्तेमाल करते हैं, तो संघर्ष विराम कूटनीतिक कामयाबी के बजाय शर्म की बात होगी।

रूस दो तरीकों से जंग जीत सकता है। पहला, वह जंग में भारी कीमत चुकाकर यूक्रेन को हराने की कोशिश करता रहे। लेकिन यह कब तक ऐसा कर पाएगा? दूसरा है, अमेरिकी असर का इस्तेमाल करके यूक्रेन पर छूट देने का दबाव बनाना। पुतिन को इसकी ज्यादा उम्मीद है। हम फिलहाल राहत की सांस ले सकते हैं कि यूक्रेनी कूटनीति से एक नई योजना सामने आई है। अगर ट्रंप प्रशासन पुतिन को कूटनीति से ऐसी जीत दिला देता है, जो वह जंग में हासिल नहीं कर सका, तो यह अमेरिका की एक बहुत बड़ी नाकामी होगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।