
रोजगार बाजार में बढ़ता फर्जीवाड़ा Publish Date : 07/01/2026
रोजगार बाजार में बढ़ता फर्जीवाड़ा
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
सबको नौकरी चाहिए, लेकिन क्या येन-केन-प्रकारेण चाहिए? उद्योगों के विस्तार के साथ मानव संसाधन की मांग भी बढ़ती चली जा रही है? जल्दी में कई बार कंपनियां फर्जी उम्मीदवारों को भी नियुक्त कर देती हैं। अफसोस, उद्योग का एक ऐसा भी हिस्सा है, जो न सिर्फ फर्जीवाड़ा कर रहा है, फर्जीवाड़े को बढ़ावा भी दे रहा है। हालांकि, ऐसी कंपनियां भी तैनात हैं, जो फर्जीवाड़े पर लगाम कस रही हैं।
यह युवा का काम ही था, कंपनी के साथ होने वाली धोखाधड़ी पकड़ने में मदद करना। लेकिन हुआ यह कि वह युवा ही अपने संभावित नियोक्ता के साथ फर्जीवाड़ा करते पाया गया। विज्ञापन, डिजिटल और वेब-आधारित मूल्यवर्धित सेवाओं में धोखाधड़ी का पता लगाने बाली एक कंपनी एमफिल्टरिंट अपने लिए एक सॉफ्टवेयर डेवलपर तलाश रही थी। चयनित उम्मीदवार को तीन साल का अनुभव था और वह अपनी उम्र के तीसरे दशक के अंत में था। नौकरी के लिए योग्यता थी, धोखाधड़ी का पता लगाने के लिए सॉफ्टवेयर बनाना।
यह युवा नौकरी के अनुकूल माना गया, साक्षात्कार भी यीडियो माध्यम से हो गया। उसे नौकरी का प्रस्ताव भी दे दिया गया और उसके दस्तावेज सत्यापन के लिए मांग गए। दस्तावेज आते ही खतरे की घंटियां बजने लगीं। जमा किए गए दस्तावेजी परदर्स चेहरे को जांचा गया, तो वह चेहरा वीडियो साक्षात्कार में दिखे चेहरे से मेल नहीं खा रहा था। कंपनी अपने ग्राहकों के साथ-साथ अपने कर्मचारियों को भी परखने के लिए एक विशेष कर्मचारी सायापन इंटरफेस का उपयोग करती है।
यह सॉफ्टवेयर सत्यता की जांच के लिए छवियों की परखता है व मिलान करता है। जांच का निष्कर्ष यह रहा कि जिस व्यक्ति का साक्षात्कार लिया गया था और जिसके दस्तावेज जमा किए गए थे, दोनों समान नाहीं थे। भर्ती रोक दी गई। यह भारत में रही धोखाधड़ी के हजारों उदाहरण में से एक है।
वह कंपनी सजग थी, तभी धोखे को पकड़ने में कामयाब रही। भारतीय उद्योगों और विशेष रूप में 75,000 से ज्यादा भारतीय कंपनियां ऐसी हैं, जो फर्जी दस्तावेज जारी करने के काम में लगी है। जिनका इस्तेमाल रोजगार पाने के लिए होता है। 30,000 से ज्यादा लोग एक अनुमान के मुताबिक हर साल नौकरी पाने के लिए फर्जीवाड़ा करते पकड़े या नौकरी से हटाए जाते हैं।
निचले स्तर से ऊपर तक झोल

रोजगार पाने के लिए होने वाली ज्यादातर धोखाधड़ी जूनियर लेथल पर होती है, क्योंकि इस स्तर पर सत्यापन कम ही होता है। एक उदाहरण, एक आईटी सेवा कंपनी में प्रबंधक दोपहर की पाली में एक कर्मचारी के खराब प्रदर्शन से चिंतित थे। एक बैठक में उन्होंने उस कर्मचारी के पिछले रिकॉर्ड देखने का फैसला किया। टीम में से ही किसी ने याद दिलाया कि सुबह की पाली में एक व्यक्ति है, जिसका प्रोफाइल इस कर्मचारी के समान है। मिलान किया गया, तो फोटो व नाम अलग थे। भौतिक जांच ने प्रबंधकों को चौका दिया।
मामला यह था कि एक ही व्यक्ति एक ही कार्यालय में दो शिफ्ट में काम कर रहा था। हालांकि, फर्जीवाड़ा बड़े अधिकारी स्तर पर भी हो सकता है। एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी के मुख्य वित्तीय अधिकारी का मामला लें, जिसे एक बुटीक कंपनी में काम पर रखा गया था। एक जांच से पता चला कि उसके बायोडाटा में चार्टर्ड अकाउंटेंट की डिग्री भी दर्ज है, लेकिन वास्तव में चार्टर्ड अकाउंटेंट नहीं है।
धोखाधड़ी को रोकना क्यों नहीं है आसान
क्या फर्जी उम्मीदवारों को रोका जा सकता है? क्या फर्जी दस्तावेज के आधार पर किसी न किसी प्रकार से नौकरी पाने के इच्छुक लोगों को रोका जा सकता है? फोरेंसिक विश्लेषकों और भर्तीकर्ताओं का कहना है, उन कंपनियों पर नजर रखाना आसान नहीं, जी पहचान बदलने में माहिर है। कुछ कंपनियां अपनी नाम पट्टिकाएं बदलती रहती हैं। अपने देश में नाम बदलना आसान है। एक जगह पाजी दस्तावेज से नौकरी पाने वालों को निकाले जाने के बावजूद कहीं न कहीं नौकरी मिल जाती है। नियम-कायदे कड़े नहीं हैं, तो कंपनियों को ही सतर्कता बरतनी पड़ती है।
गलत लोगों की मिलीभगत से चलता स्याह कारोबार
नौकरी देने वाली कंपनियों और एचआर टीमों के बीच मिली भगत से भी धोखे वाली नियुक्तियां हो रही है। धोखाधड़ी में एचआर टीमों से जो मदद मिल रही है, उसे पकड़ना आसान नहीं है। यह मदद ज्यादातर अज्ञात ही रहती है। कौशल विकास संस्थान भी नौकरी के उम्मीदवारों की योग्यता को बढ़ा-चढ़ाकर बताने का माध्यम बन जाते हैं।
प्रशिक्षण संस्थानों के ज्यादातर प्रमाण पत्र योग्यता का दस्तावेज नहीं, सामान्य सूचना मात्र होते हैं। फर्जी दस्तावेज बनाना और बोटना एक कारोकर बन गया है। पकड़े जाने पर कम सजा भी मिलीभगत से ही मुमकिन होती है।
अगर सुधार नहीं हुआ, तो बढ़ती चली जाएगी समस्या
अनेक कंपनियों ने कर्मचारियों को जूम मीटिंग की थकान से बचाने के लिए अपना वीडियो ऑफ रखने को मजूरी दे रखी है। यह बात सामने आई है कि कंपनियों द्वारा दी गई राहत का इस्तेमात अनेक लोगों ने दूसरी कंपनियों को सेवाएं देने के लिए किया है। सावधान रहने और सुधार करने की जरूरत है। आगे चलकर धोखाधड़ी की आवृत्ति और अधिक जटिल हो सकती है, क्योंकि सफेदपोश क्षेत्र में धोखेबाज अधिकारी मुख्य भूमिकाएं निभाना शुरू कर देंगे। अयोग्य अधिकारी ऊपर पदों पर बैठेंगे, तो जाहिर है, अयोग्यता को ही बढ़ावा मिलेगा।
रोकथाम के लिए चंद उपाय
कोई एक ही साथ एकाधिक जगहों पर काम न कर सके, इसके लिए उपाय आजमाए जाने लगे हैं। सतर्क कंपनियों ने अब यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (यूएएन) मागना शुरू कर दिया है, जिसका उपयोग यह पता लगाने के लिए किया जा सकता है कि कर्मचारी को हर महीने अन्य स्रोतों से पैसा मिल है या नहीं। पहले सिर्फ सैलरी स्लिप मांगते थे, लेकिन अब यूएएन की भी मांग होने लगी है, ताकि धोखाधड़ी का पता लगाया जा सके। धोखाधड़ी करने वालों को तुरंत कंपनी से जाने के लिए कहा जाता है। युरोप वा अमेरिका में फर्जीवाड़ा करने वालों को काली सूची में जलने के वाद डाटाबेस पर सार्वजनिक कर दिया जाता है। भारत में सबसे ज्यादा रियायत है, लेकिन अब यहां रोजगार क्षेत्र में फर्जीवाड़े को रोकने के कड़े उपाय होने चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
