स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका      Publish Date : 13/12/2025

                      स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका

                                                                                                                                                                                     प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

वर्ष 1905 में जब बंगाल विभाजन के प्रयास चल रहे थे, तब वंदे मातरम स्वाधीनता का नारा बनकर उभरा था। इससे अंग्रेज सरकार बौखला गई है और उसने वन्दे मातरम शब्द को ही प्रतिबंधित कर दिया था, जिस किसी ने भी वंदे मातरम बोला उसे राजद्रोह के आरोप में दंडित किया जाने लगा, क्योंकि स्वाधीनता की पूरी लड़ाई तत्कालीन राज्य के प्रति द्रोह की ही तो थी।

                                                               

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ0 हेडगेवार जी जब निलसिटी हाइस्कूल में मैट्रिक की पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्होंने अपने साथियों के साथ वन्दे मातरम को प्रतिबंधित करने वाले रेसले सर्कुलर का विरोध करते हुए एक अंग्रेज अधिकारी के सामने ही वन्दे मातरम बोल कर किया था जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा। क्रांतिकारी त्रैलोक्य नाथ चक्रवर्ती अपनी आत्मकथा जेल के तीस बरस में लिखते हैं कि कलकत्ता में मेडिकल की पढ़ाई करते समय डॉ0 हेडगेवार जी कोकेन के गुप्त नाम से अनुशीलन समिति में उनकी टीम के प्रमुख कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रहे थे, जो कांग्रेस आज स्वयं को आजादी दिलाने वाली स्वयं को एक मात्र पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती है असल में वह कांग्रेस तत्कालीन देशभक्तों का ही एक संगठन था।

वर्ष 1920 में नागपुर में हुए कांग्रेस के अधिवेशन की संपूर्ण व्यवस्था जिन दो लोगों के कंधों पर थी उनमें से एक थे डॉ हार्डीकर और दूसरे थे डॉ हेडगेवार। अधिवेशन में संकल्प समिति की टीम का हिस्सा रहे डॉ हेडगेवार ने कांग्रेस की अंग्रेजों के अधीन रहते हुए अपने शासन की मांग का विरोध करते हुए प्रस्ताव लिखा, जो कि इस प्रकार है- कांग्रेस का लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना और भारतीय गणतंत्र की स्थापना करना तथा दुनिया के अन्य देशों को पूंजीवादी साम्राज्यवाद की शोषण से मुक्त करना है। लेकिन कांग्रेस ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया, और 6 मार्च 1921 को मॉडर्न रिव्यू नामक पत्रिका ने लिखा कि जिस प्रस्ताव को विचारकों ने मजाक का विषय बना दिया उस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए था।

                                                            

इसके 9 साल बाद 1929 लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव कांग्रेस ने पारित किया। अर्थात उस समय भी संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार जी जैसे राष्ट्रभक्त लोग विचार और व्यवहार में कांग्रेस से कई वर्ष आगे थे।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।