हिन्दु धर्म में है तर्क और भावना का समन्वय      Publish Date : 20/11/2025

                    हिन्दु धर्म में है तर्क और भावना का समन्वय

                                                                                                                                                                               प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

मनुष्य के जीवन में तर्क और भावना दोनों साथ-साथ ही चलते हैं। कभी तर्क किसी बात को समझता है, लेकिन भावना उसको स्वीकार नहीं करती है तो कभी भावना किसी बात को मान लेती है लेकिन उसका कोई तर्क समझ में नहीं आता है। जब इन दोनों का द्वंद्व चलता है तो मनुष्य की निर्णय लेने की क्षमता कम हो जाती है लेकिन इन दोनों का परस्पर समन्वय बड़ी-बड़ी दुविधा से व्यक्ति को निकाल कर ले जाता है।

कुछ विचार स्वयं को तार्किक होने का दावा करते हैं लेकिन वह भावनाओं से ऊपर नहीं उठ पाते, तो कुछ विचार भावनाओं में इतने बह जाते हैं कि उन्हें कोई तर्क समझ में ही नहीं आता।

श्रद्धा और विश्वास के कारण हमारे मन में जो भावना उत्पन्न होती है उसके बाद जब हम कुछ तर्क करते हैं तो वह तर्क हमें और अधिक जिज्ञासु बनाता है परंतु बिना श्रद्धा के जब तर्क करते हैं तो सामने वाले को अनुभव होता है कि तर्क नहीं कुतर्क हो रहा है। हिंदू जगत का आध्यात्म तर्क और भावना दोनों से परिपूर्ण है।

यह जानने का प्रयास करना आवश्यक है कि कोई काम क्यों हो रहा है यह क्यों घटित हो रहा है क्योंकि इस प्रकार की जिज्ञासा ने ही आगे चलकर विज्ञान का स्वरूप लिया है लेकिन इसके पहले वह जो कुछ घटित हो रहा है उसकी प्रति एक दृढ़ विश्वास रखना होता है और वह विश्वास बनाए रखने में भावना की बड़ी भूमिका होती है।

                                                              

अपने किसी मित्र, सगे संबंधी से भावनात्मक रूप में पूछा गया कोई भी प्रश्न कभी-कभी स्वयं उनको सही बात का ज्ञान करता है या कभी पूछने वाले को परंतु यदि उन प्रश्नों में भावना ना हो केवल तर्क हो तो वह दोनों के संबंध सदैव के लिए समाप्त करने की दिशा में बढ़ जाता है।

सनातन परंपरा में ईश्वर के अवतारों या महापुरुषों ने सदैव भावनात्मक संवाद स्थापित किया है। हमारे अधिकांश ग्रंथ संवादों पर ही आधारित है। इन संवादों में जहां प्रभावी तर्क है तो वही एक दूसरे के प्रति श्रेष्ठता की भावना भी। अर्जुन और भगवान कृष्ण का संवाद इसका उदाहरण है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।